पर्यूषण महापर्व में जप-तप, साधना और भक्ति से जीवन को बनाएं सार्थक : सुकन मुनि

पाली : रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत शनिवार को आयोजित धर्मसभा में संतों ने श्रावक-श्राविकाओं को पर्यूषण महापर्व के महत्व, तपस्या, भक्ति, संयम और स्वधर्मी बंधुओं की सेवा का संदेश दिया। धर्मसभा में गुरुदेव सुकन मुनि ने अपने प्रवचन में कहा कि पर्यूषण महापर्व आत्मशुद्धि और साधना का पर्व है। इस दौरान प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक जप, तप, तपस्या, सामायिक, नवकारसी एवं धार्मिक आराधना करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दूसरों को गिराने की भावना रखने वाला व्यक्ति एक दिन स्वयं ही गिर जाता है। मनुष्य को हमेशा दूसरों को आगे बढ़ाने और उनका उत्थान करने की भावना रखनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मोर की आवाज भले ही मधुर होती है, लेकिन वह सांप को भी निगल जाता है। इसलिए केवल मधुर वाणी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन के भाव भी निर्मल होने चाहिए।
सुकन मुनि ने कहा कि पर्यूषण महापर्व के दौरान व्यक्ति को अपनी वाणी और व्यवहार पर विशेष नियंत्रण रखना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से कम बोलने, मीठा बोलने और अनावश्यक विवादों से बचने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि हम अपनी जबान पर संयम रखेंगे तो इससे स्वयं को भी लाभ होगा और दूसरों को भी दुख नहीं पहुंचेगा।
उन्होंने कहा कि पर्यूषण महापर्व का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि इस दौरान धर्म आराधना और तपस्या नहीं की तो समय निकल जाएगा और बाद में पछतावा ही हाथ आएगा। इसलिए इन दिनों में अधिक से अधिक भक्ति, तप, सामायिक और जिनवाणी श्रवण करना चाहिए।
इससे पूर्व डॉ. वरुण मुनि ने अपने प्रवचन में भावना, भक्ति और समर्पण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संत जब किसी श्रावक के घर गोचरी के लिए पधारते हैं तो यह घर-परिवार के लिए सौभाग्य का अवसर होता है। उन्होंने कहा कि संतों की साधना में श्रावक-श्राविकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है और गोचरी की व्यवस्था करवाना श्राविकाओं की सेवा एवं भक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है।
उन्होंने कहा कि जिन माताओं की कोख से संत जन्म लेकर वैराग्य के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, उनके प्रति भी समाज में श्रद्धा और सम्मान का भाव होना चाहिए। संतों की साधना और तपस्या में श्रावक-श्राविकाओं की सेवा भावना महत्वपूर्ण योगदान देती है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि जब संत घर आएं तो पूरे श्रद्धा भाव से उनका स्वागत करना चाहिए, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना चाहिए और मांगलिक सुनना चाहिए। संत का आगमन भाग्य का विषय है और ऐसे अवसरों को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति एवं आत्मकल्याण के अवसर के रूप में देखना चाहिए।

डॉ. वरुण मुनि ने धर्मसभा में स्वधर्मी बंधुओं की सहायता का संदेश देते हुए कहा कि यदि कोई जैन भाई आर्थिक परेशानी के कारण भूखा सो रहा है तो समाज के संपन्न लोगों को उसकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रति स्वाभाविक रुचि रखने वाले व्यक्ति को अपने स्वधर्मी भाई की परेशानी को समझना चाहिए और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धन का वास्तविक उपयोग तभी है, जब उससे किसी जरूरतमंद के जीवन में राहत और खुशी लाई जा सके। केवल धन संग्रह करने से जीवन धन्य नहीं होता, बल्कि जरूरत के समय किसी के काम आना ही सच्ची मानवता और धर्म भावना है।
उन्होंने कहा कि पैसे से हर किसी का दिल नहीं जीता जा सकता, लेकिन भक्ति और स्नेह के भाव से दिल जीता जा सकता है। संतों की संवेदनशीलता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चिकित्सक मरीज का चेहरा देखकर उसकी बीमारी का अंदाजा लगा लेते हैं, उसी प्रकार संत भी व्यक्ति के चेहरे और भाव देखकर उसके मन की स्थिति को समझ लेते हैं।
डॉ. वरुण मुनि ने श्रावक-श्राविकाओं से आह्वान किया कि पर्यूषण महापर्व के आठ दिनों में अधिक से अधिक समय धर्म आराधना में लगाएं। उन्होंने कहा कि संभव हो तो व्यवसाय और अन्य व्यस्तताओं को सीमित कर इन दिनों में तप, नवकारसी, सामायिक और जिनवाणी श्रवण को प्राथमिकता दें।
उन्होंने कहा कि पर्यूषण केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का अवसर है। इन दिनों में व्यक्ति को अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
कार्यक्रम में इससे पूर्व साध्वी प्रीति सुधा ने भी प्रवचन दिए। उन्होंने धर्म, संयम और आत्मकल्याण के विषय पर श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन प्रदान किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने संतों के प्रवचन सुने और धार्मिक आराधना में भाग लिया।
धर्मसभा के पश्चात कार्यक्रम मंत्री प्रकाश कटारिया ने तपस्या करने वाले तपस्वियों की अनुमोदना की। उन्होंने चातुर्मास एवं आगामी धार्मिक कार्यक्रमों की जानकारी भी श्रद्धालुओं को दी।
कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह नजर आया। धर्मसभा में संतों ने सभी से पर्यूषण महापर्व को आत्मसंयम, तपस्या, सेवा, भक्ति और स्वाध्याय के साथ मनाने का आह्वान किया।



