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पाली में चातुर्मास के दौरान सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा का शुभारंभ, डॉ. वरुण मुनि ने सत्य, धर्म और चरित्र का बताया महत्व

पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत शनिवार को सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा का शुभारंभ हुआ। कथा के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का विस्तार से वर्णन करते हुए सत्य, धर्म, दान, कर्तव्य, चरित्र और आसक्ति से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश दिए।

डॉ. वरुण मुनि ने कथा का शुभारंभ करते हुए प्राचीन अयोध्या के वैभव का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि अवध और अयोध्या की राजधानी कौशल में राजा और प्रजा के बीच पिता-पुत्र जैसा संबंध माना जाता था। प्रजा धर्म का आचरण करती थी और राज्य में लोगों के सुख-दुख का ध्यान रखा जाता था। सरयू नदी के किनारे हरियाली से परिपूर्ण अयोध्या को उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि इसी अयोध्या की धरती पर सम्राट दिलीप, रघु, दशरथ और भगवान राम जैसे महान चरित्रों का संबंध रहा। इसी परंपरा में राजा हरिश्चंद्र का भी नाम सत्य, दान और धर्म के लिए लिया जाता है।

डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे धर्म के प्रति समर्पित राजा थे। जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना, दोनों हाथों से दान करना और अपनी वाणी में मधुरता रखना उनके व्यक्तित्व की विशेषता बताई गई।

कथा के माध्यम से उन्होंने समझाया कि व्यक्ति के जीवन में धन, जवानी और शक्ति आने के साथ यदि विवेक और संयम का अभाव हो जाए तो परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में मिली शक्ति और संपत्ति का सदुपयोग तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने विवेक और चरित्र को बनाए रखे।

कथा के दौरान राजा हरिश्चंद्र के जीवन में आए पारिवारिक मोह और आसक्ति के प्रसंगों का भी वर्णन किया गया। डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य और राजधर्म के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। पांच इंद्रियों में से किसी एक पर भी नियंत्रण कमजोर पड़ जाए तो व्यक्ति के जीवन में विचलन आ सकता है।

उन्होंने प्रेम और आसक्ति के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि प्रेम जीवन को ऊंचा उठाने वाला होना चाहिए, जबकि अत्यधिक आसक्ति व्यक्ति को अपने कर्तव्य से दूर कर सकती है। उन्होंने श्रोताओं से जीवन में संयम, विवेक और चरित्र को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।

कथा में रानी तारा से जुड़े प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया गया कि जब राजा के राजकार्य में व्यक्तिगत लगाव का प्रभाव दिखाई देने लगा और कर्मचारियों द्वारा अपने कर्तव्यों में लापरवाही तथा भ्रष्ट आचरण की बातें सामने आने लगीं, तो इसकी जानकारी रानी तारा तक पहुंची।

रानी तारा ने राज्य की वास्तविक स्थिति जानने के लिए अपने स्तर पर जानकारी जुटाई। जब उन्हें पता चला कि प्रजा राजा के शासन और व्यवस्था को लेकर असंतुष्ट है तथा इसका प्रभाव राजा की प्रतिष्ठा पर भी पड़ रहा है, तो उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपने पति को वास्तविक स्थिति से अवगत कराकर उन्हें कर्तव्य और राजधर्म के मार्ग पर वापस लाने का प्रयास करेंगी।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि व्यक्ति का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पहचान होता है। यदि व्यक्ति मोह, आसक्ति और गलत संगति में उलझ जाता है तो उसका प्रभाव उसके व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ परिवार और समाज पर भी पड़ता है। उन्होंने श्रोताओं से आह्वान किया कि जीवन में ऐसे आचरण को अपनाया जाए जिससे समाज में सम्मान और विश्वास कायम रहे।

उन्होंने कहा कि कथा के प्रसंग केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उनसे जीवन के लिए सीख लेने के उद्देश्य से हैं। सत्य, संयम, कर्तव्य और चरित्र को जीवन में उतारना ही धार्मिक श्रवण की सार्थकता है।

कथा के बाद उपप्रवर्तक अमृत मुनि ने उपस्थित तपस्वियों का पचकान कराया। इस दौरान राणावास से शिमला देवी के 35 उपवास के तप की जानकारी दी गई। उनके आगामी पचकान का भी उल्लेख किया गया।

कार्यक्रम के दौरान मंत्री प्रकाश कटारिया ने भीलवाड़ा से आए अभय कुमार कोठारी और लक्ष्मण सिंह का श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की ओर से शरबत जी पगारिया के माध्यम से बहुमान करवाया। इस अवसर पर संघ के पदाधिकारी, श्रावक-श्राविकाएं और धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।

रविवार को मनाया जाएगा सामायिक दिवस

चातुर्मास कार्यक्रम के तहत रविवार को सामायिक दिवस मनाया जाएगा। संघ की ओर से अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से सामायिक कर कार्यक्रम में पधारने का आग्रह किया गया है। आयोजकों ने बताया कि सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के चरित्र का वाचन आगामी दिनों में भी जारी रहेगा, जिसके माध्यम से श्रद्धालुओं को सत्य, धर्म, संयम और चरित्र से जुड़े जीवन मूल्यों की प्रेरणा दी जाएगी।

Rajasthan Today

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