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पाली में डॉ. वरुण मुनि का संदेश—जीवन में कभी न छोड़ें धर्म की राह, गुरुजनों की सीख को बनाएं जीवन का आधार

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत त्रिगुरु जन्म जयंती समारोह के दूसरे दिन मानवता के मसीहा एवं दिव्य विभूति उपाध्याय पुष्कर मुनि के जीवन, संघर्ष, त्याग और धर्म के प्रति समर्पण पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इस दौरान संतों ने पुष्कर मुनि के प्रेरणादायी जीवन प्रसंगों को साझा करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।

कार्यक्रम में डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि मनुष्य को जीवन में कभी भी धर्म की राह नहीं छोड़नी चाहिए। गुरुजनों की शिक्षाओं को अपने जीवन में ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से विचलित नहीं होता। उन्होंने उपाध्याय पुष्कर मुनि के जीवन संघर्ष का विस्तार से वर्णन करते हुए उनके त्याग और साधना को समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया।

डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि उपाध्याय पुष्कर मुनि का जन्म 17 अक्टूबर 1918 को मेवाड़ क्षेत्र के जसवंतगढ़ गांव में एक पालीवाल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम अंबालाल रखा गया। उनका बाल्यकाल सहज नहीं रहा और छोटी उम्र में ही उन्हें अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

बताया गया कि करीब नौ वर्ष की उम्र में उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अंबालाल को उचित स्नेह नहीं मिल पाया। बाद में वे अपने नाना-नानी के यहां रहने लगे। वहां सेठ अंबालाल ने उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया, लेकिन समय के साथ परिस्थितियां फिर कठिन हो गईं।

कम उम्र में ही उन्हें पशु चराने जैसे काम सौंप दिए गए। एक दिन जंगल में ठोकर लगने से वे गिर पड़े और घायल हो गए। घर लौटने पर उन्हें सहानुभूति के बजाय फटकार का सामना करना पड़ा। इन घटनाओं ने उनके मन को गहराई से प्रभावित किया और संसार के प्रति वैराग्य की भावना प्रबल होने लगी।

डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि इसी दौरान गांव में साध्वी फूलकंवरजी का आगमन हुआ। अंबालाल उनके दर्शन करने पहुंचे और अपने जीवन की पीड़ा उनके सामने रखी। साध्वीजी ने उन्हें संसार की नश्वरता और कर्मों से मुक्ति के लिए साधना के महत्व के बारे में समझाया।

इन विचारों से प्रभावित होकर अंबालाल ने साधु बनने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें संत ताराचंदजी के पास जाने की सलाह दी गई। कुछ समय बाद संत ताराचंदजी के आगमन पर अंबालाल ने उनके चरणों में पहुंचकर दीक्षा की इच्छा प्रकट की। इसके बाद विक्रम संवत 1981 में जालौर क्षेत्र के गढ़ में उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और उनका नाम पुष्कर मुनि हुआ।

पुष्कर मुनि ने संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया और अपनी विद्वत्ता, साधना तथा आध्यात्मिक क्षमता के बल पर उपाध्याय पद प्राप्त किया। वे ऐसे संत के रूप में प्रतिष्ठित हुए, जिनके पास श्रद्धालु अपनी शंकाओं के समाधान के लिए आते थे। उन्होंने अनेक साधु-साध्वियों को दीक्षा देकर धर्म और जिन शासन की सेवा की।

डॉ. वरुण मुनि ने उपाध्याय पुष्कर मुनि के गुरु-शिष्य संबंधों का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने अपने शिष्यों को धर्म, अनुशासन और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ाया। आचार्य देवेंद्र मुनि को उन्होंने योग्य शिष्य के रूप में तैयार किया। उनके जीवन का उद्देश्य जिन शासन की प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाना रहा।

वक्तव्य में बताया गया कि पुष्कर मुनि ने अपने जीवन में त्याग, तपस्या और संघर्ष के माध्यम से समाज को नई दिशा दी। उनके जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए।

प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र की कथा भी सुनाई। उन्होंने बताया कि राजा हरिश्चंद्र ने सत्य की रक्षा के लिए अपना राजपाट तक त्याग दिया, लेकिन अपने वचन और सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा।

कथा के माध्यम से उन्होंने समझाया कि धर्म और सत्य के रास्ते पर चलने वाले व्यक्ति की परीक्षा अवश्य होती है, लेकिन उसे अपने आदर्शों से विचलित नहीं होना चाहिए। त्याग, संयम और सत्यनिष्ठा मनुष्य के जीवन को महान बनाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि महापुरुषों के जीवन प्रसंगों को याद कर उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए, क्योंकि उनके आदर्श जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।

कार्यक्रम में गुरुदेव सुकन मुनि ने आशीर्वचन देते हुए तीनों संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की और श्रद्धालुओं से नियमित धार्मिक साधना करने का आह्वान किया। उन्होंने सामायिक सहित धार्मिक क्रियाओं में भाग लेने और संतों के बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि महापुरुषों का स्मरण और उनके आदर्शों का अनुसरण समाज को संस्कारवान बनाता है। श्रद्धालुओं को धर्म के प्रति आस्था बनाए रखते हुए अपने जीवन में सदाचार और संयम को स्थान देना चाहिए।

श्री गुरु पुष्कर संघ के उपाध्यक्ष होशियार राज मेहता ने कहा कि यह संघ और समाज का सौभाग्य है कि उन्हें तीन महान संतों की जन्म जयंती मनाने का अवसर मिल रहा है। उन्होंने कहा कि इन संतों ने समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने और धार्मिक चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संघ के मंत्री प्रकाश कटारिया ने भी तीनों संतों के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उनके त्याग, तपस्या और संघर्ष को याद किया। उन्होंने कहा कि संतों ने अपने जीवन को जिन शासन की सेवा के लिए समर्पित किया और धर्म की प्रतिष्ठा को ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य किया। उन्होंने समाज के श्रावक-श्राविकाओं से आगामी कार्यक्रमों में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के दौरान श्री गुरु पुष्कर संघ की महिला मंडल की सदस्यों ने गुरुजनों के प्रति वंदना प्रस्तुत की। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने संतों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।

कार्यक्रम के तहत 13 अक्टूबर को पुष्कर साधना केंद्र में सामूहिक नवकार मंत्र जाप का आयोजन किया जाएगा। इसमें श्रद्धालु जोड़ों में शामिल होकर नवकार मंत्र का जाप करेंगे। इसके साथ ही आगामी कार्यक्रम में दीक्षा ग्रहण करने वाली दो बैरागन बहनों के स्वागत का आयोजन भी प्रस्तावित है।

कार्यक्रम की तैयारियों में पुष्कर साधना संस्थान केंद्र के अध्यक्ष मांगीलाल मुणोत, लालचंद मेहता, कांतिलाल छाजेड़, दिनेश चंद नाहर, गौतम संचेती, अमरचंद संचेती और सज्जन धारोलिया सहित अन्य सदस्य जुटे हुए हैं। गुरु देवेंद्र जैन युवा संगठन और गुरु देवेंद्र महिला मंडल भी आयोजन में सहयोग कर रहे हैं।

समारोह के माध्यम से श्रद्धालुओं को संतों के जीवन से प्रेरणा लेने, धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने और सत्य, त्याग तथा सदाचार को अपने जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया।

Rajasthan Today

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