पाली में त्रिगुरु जयंती पर गूंजा नवकार मंत्र, दो युवतियों ने दीक्षा लेने का लिया संकल्प

पाली : त्रिगुरु जयंती महोत्सव के तीसरे दिन मंगलवार को मांडिया रोड स्थित श्री पुष्कर साधना केंद्र में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण रहा। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह ध्वजारोहण के साथ हुई। इसके बाद सुबह 9 बजे से सजोड़ों नवकार मंत्र जाप का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर महिलाओं ने लाल साड़ी और पुरुषों ने सफेद वस्त्र धारण कर सामूहिक जाप में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में गुरु भक्ति, नवकार मंत्र की महिमा, उपाध्याय पुष्कर मुनि के जीवन प्रसंगों और संयम मार्ग के महत्व पर प्रवचन हुए। विशेष आकर्षण दो बैरागन बहनों की ओर से दीक्षा लेने की घोषणा रही। दोनों आगामी 11 दिसंबर को भीम में गुरु मां जयमालाजी के सानिध्य में दीक्षा ग्रहण करेंगी।
नवकार मंत्र जाप के बाद पुष्कर महिला मंडल की महिलाओं ने गुरु भक्ति से ओतप्रोत गीत प्रस्तुत किया। ‘गुरु पुष्कर होवे जय-जयकार, जयंती मनावे हम सब मिलकर’ जैसे भक्ति गीतों के माध्यम से गुरुजनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई। कार्यक्रम में रितु मेहता ने भी गुरु स्वागत में गीत प्रस्तुत कर माहौल को भक्तिमय बनाया।
इसके बाद पुष्कर साधना केंद्र के गौतम कवर्ड की ओर से नवकार मंत्र जाप से जुड़ी मालाओं की बोलियां लगाई गईं। अरिहंत पद, नमो सिद्धाणं, नमो संघ, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं और नमो लोए सव्वसाहूणं सहित नवकार मंत्र के विभिन्न पदों से जुड़ी मालाओं के लिए बोली लगाई गई। इसके बाद चादर की बोली लगाई गई, जिस पर नवकार मंत्र का पाठ किया गया। आयोजन में प्राप्त राशि जीवदया के कार्यों में खर्च की जाएगी।

कार्यक्रम का भावपूर्ण प्रसंग उस समय सामने आया, जब आगामी 11 दिसंबर को भीम में दीक्षा लेने वाली दो बैरागन बहनों ने अपने विचार व्यक्त किए। धागड़वास निवासी सोनू ने कहा कि बचपन से उन्होंने खाना-पीना और खेलना जैसे सामान्य जीवन के अनुभव देखे हैं, लेकिन अब उनका मन संयम के मार्ग पर चलने और गुरु चरणों में रहकर दीक्षा लेने का है।
वहीं जोधपुर निवासी कम उम्र की शिवानी ने कहा कि वह आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाने के उद्देश्य से संयम मार्ग अपनाना चाहती हैं। उन्होंने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि उम्र भले ही छोटी है, लेकिन आत्मबल मजबूत है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से अपनी दीक्षा के अवसर पर पहुंचकर आशीर्वाद देने की अपील की।
दोनों बहनों की दीक्षा गुरु मां जयमालाजी के सानिध्य में 11 दिसंबर को भीम में प्रस्तावित है। संतों और श्रद्धालुओं ने उनके संयम मार्ग अपनाने के निर्णय की अनुमोदना की।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि महापुरुषों की जयंती मनाने का वास्तविक उद्देश्य उनके जीवन से प्रेरणा लेना और उनके बताए मार्ग पर चलना है। सम्राट आचार्य अमरसिंहजी, आचार्य ताराचंदजी और उपाध्याय पुष्कर मुनि के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इन महापुरुषों ने जीवन की कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने जीवन को सफल बनाया।
उन्होंने श्रद्धालुओं से सवाल किया कि यदि परमात्मा या कोई महान संत सामने आकर उनसे कुछ मांगने को कहे, तो वे क्या मांगेंगे? आमतौर पर व्यक्ति गाड़ी, बंगला, पैसा और ऐशो-आराम की कामना करता है, लेकिन जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है कि मनुष्य किसी को दुख न पहुंचाए और अपने व्यवहार में प्रेम तथा सद्भाव बनाए रखे।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि किसी के प्रति बुरा नहीं सोचना चाहिए और न ही बुराई को बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने परिवार और समाज में प्रेमपूर्ण व्यवहार अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि प्रेम केवल अपने प्रियजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जिन लोगों से विचार नहीं मिलते, उनके साथ भी सम्मान और सद्भाव से पेश आना चाहिए। पति-पत्नी और सास-बहू सहित पारिवारिक संबंधों में क्षमा, समझ और परस्पर सम्मान आवश्यक हैं।
उन्होंने धर्मशास्त्रों में वर्णित पुरुषों के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करते हुए व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन मूल्यों पर भी विचार रखे। प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को अपने आचरण में सुधार करने और दूसरों के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश दिया गया।

प्रवचन के दौरान अमृत मुनि ने उपाध्याय पुष्कर मुनि के जीवन से जुड़ा प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार पुष्कर मुनि जैतारण के पवन धाम गए थे। उस समय उन्हें लगभग 105 डिग्री बुखार था। उन्होंने गुरुदेव मिश्रीमलजी के समक्ष स्वस्थ होने पर विहार करने की भावना व्यक्त की। कुछ ही दिनों में वे विहार के लिए तैयार हो गए।
अमृत मुनि ने पुष्कर मुनि के जीवन में गुरु भक्ति, अनुशासन और साधना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उनके जीवन के प्रसंग आज भी श्रद्धालुओं को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और अपने संकल्पों पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देते हैं।
गुरुदेव सुकन मुनि ने अपने आशीर्वचन में सभी गुरुजनों को नमन करते हुए नवकार मंत्र की महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नवकार मंत्र जैन धर्म का अत्यंत पवित्र मंत्र है और इसका जाप आत्मिक शांति, श्रद्धा तथा आध्यात्मिक साधना से जुड़ा है।
उन्होंने उपाध्याय पुष्कर मुनि के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था और उन्होंने आचार्य ताराचंदजी के सानिध्य में जालौर में दीक्षा ग्रहण की। गुरु-शिष्य के बीच विशेष प्रेम और समर्पण का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आचार्य ताराचंदजी की पुष्कर मुनि के प्रति गहरी आत्मीयता थी। पुष्कर मुनि के आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के बाद आचार्य ताराचंदजी ने संथारा ग्रहण किया। उनके शिष्य देवेंद्र मुनि और आगे नरेश मुनि जैसे संतों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

कार्यक्रम के दौरान श्री पुष्कर साधना केंद्र की ओर से आए हुए अतिथियों का माला पहनाकर स्वागत किया गया। आयोजन में संस्थान के अध्यक्ष मांगीलाल मुणोत, लालचंद मेहता, कांतिलाल छाजेड़, दिनेश नाहर, गौतम संचेती, अमरचंद संचेती और सज्जन धारोलिया सहित अनेक सदस्यों का सहयोग रहा। देवेंद्र जैन युवा संगठन और महिला मंडल ने भी कार्यक्रम की व्यवस्थाओं में सहभागिता निभाई।
नवकार मंत्र जाप, गुरु भक्ति गीतों और संतों के प्रवचनों के बाद गौतम प्रसादी का आयोजन किया गया। त्रिगुरु जयंती के इस कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, गुरु भक्ति, प्रेम और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली।



