पाली जिले में जलवायु अनुकूल खेती पर एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन

पाली : ग्रामीण विकास विज्ञान समिति उप केंद्र पाली के तहत डीएचडब्ल्यूजी परियोजना के अंतर्गत जलवायु अनुकूल खेती पर एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन अरटिया में किया गया। इस प्रशिक्षण शिविर में ग्रामिण महिला, किशोरियाँ, बालिकाएँ और किसान बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। मुख्य प्रशिक्षक करनाराम छापरिया ने किसानों को जैविक खेती के महत्व, जैविक खाद निर्माण व खेतों में रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों से होने वाले नुकसान के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी।
करनाराम छापरिया ने बताया कि जलवायु अनुकूल खेती के अंतर्गत जैविक खाद कैसे तैयार किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैविक खाद तैयार करने के लिए किसान को 3*5 फीट गहरा गड्ढा खोदना होगा, उसमें गोबर, गोमूत्र, नीम की पत्तियाँ, आंवला छिलके आदि भरने के बाद पानी डालकर मिट्टी की परत से ढक देना होता है। इसे छह महीने सड़ने दिया जाता है, जिससे प्राकृतिक खाद तैयार होती है, जो खेत की उर्वरता को लंबे समय तक बनाये रखती है।

साथ ही उन्होंने डीएपी व यूरिया खाद के अधिक उपयोग से होने वाले नुकसान, मिट्टी की उर्वरता पर प्रभाव, जल प्रदूषण व पर्यावरण संकट के विषय में भी किसानों को अवगत कराया। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि कीटनाशक दवाइयों का उपयोग कम से कम करें और जैविक तरीकों को अपनाकर स्थायी खेती प्रणाली को अपनाएं।
करनाराम ने ग्राविस द्वारा लगाए गए फलदार पौधों के यूनिट की सही कटाई छटाई व प्रबंधन की प्रक्रिया पर भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कटाई का समय व विधि फसल उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसके अलावा, जहां फसल उत्पादन बंद हो गया हो, वहां मिगनी खाद (सड़ा हुआ गोबर व अन्य जैविक पदार्थ) डालने से भूमि की उर्वरता बढ़ती है।
इस अवसर पर मीरा, द्वारकी, लक्ष्मी, सोमाराम, शंकरलाल, पारसराम, मुकेश, ओमप्रकाश सहित अन्य दर्जनों ग्रामीण उपस्थित रहे। प्रशिक्षण के अंत में सभी ग्रामीणों ने कृषि में जैविक तकनीकों को अपनाने की प्रेरणा ली और आगे भी ऐसे प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने की मांग की।
यह प्रशिक्षण अभियान किसानों को सतत खेती के मार्ग पर अग्रसरित करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्वस्थ कृषि प्रणाली तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।



