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पाली में पहली बार टेक्सटाइल सस्टेनेबिलिटी कॉन्क्लेव, प्रदूषण और जल संकट पर उद्योग-विशेषज्ञों का मंथन

पाली : राजस्थान के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्र पाली में आयोजित प्रथम टेक्सटाइल सस्टेनेबिलिटी कॉन्क्लेव में टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों, निर्माताओं, पर्यावरण परामर्शदाताओं एवं तकनीकी प्रदाताओं ने प्रदूषण नियंत्रण और जल प्रबंधन से जुड़ी गंभीर चुनौतियों पर गहन चर्चा की। सम्मेलन में टेक्सटाइल इकाइयों के समक्ष बढ़ती पर्यावरणीय अनुपालन समस्याओं के स्थायी और व्यावहारिक समाधान तलाशने पर विशेष जोर दिया गया।

कॉन्क्लेव में वक्ताओं ने बताया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित अपशिष्ट जल उपचार एवं डिस्चार्ज मानकों का अनुपालन टेक्सटाइल इकाइयों के लिए दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। विशेषकर पाली जैसे टेक्सटाइल क्लस्टर में उच्च टीडीएस युक्त अपशिष्ट जल और सीमित जल संसाधनों के कारण उद्योगों पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।

स्प्रे इंजीनियरिंग डिवाइसेज़ लिमिटेड (SED) के तत्वावधान में आयोजित इस कॉन्क्लेव में टेक्सटाइल निर्माता, पर्यावरण विशेषज्ञ, तकनीक प्रदाता एवं नियामक संस्थाओं के प्रतिनिधि एक मंच पर एकत्र हुए। सम्मेलन का उद्देश्य ऐसे प्रदूषण नियंत्रण समाधान प्रस्तुत करना रहा, जो न केवल नियामकीय मानकों के अनुरूप हों बल्कि दीर्घकाल तक टिकाऊ भी सिद्ध हों।

SED के मैनेजिंग डायरेक्टर विवेक वर्मा ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में टेक्सटाइल उद्योग को उन तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है, जो जमीनी स्तर पर पहले से सफल सिद्ध हो चुकी हों। उन्होंने बताया कि मैकेनिकल वेपर रिकम्प्रेशन आधारित लो-टेम्परेचर इवैपोरेशन (LTE®) प्रणाली जटिल टेक्सटाइल अपशिष्ट जल के उपचार में अत्यंत प्रभावी है और निरंतर अनुपालन सुनिश्चित करती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक 99 प्रतिशत तक जल पुनर्प्राप्ति करने में सक्षम है, जिससे वास्तविक ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। भाप के स्थान पर विद्युत ऊर्जा के उपयोग से परिचालन लागत में लगभग 75 प्रतिशत तक कमी आती है, जिससे उद्योगों को आर्थिक लाभ भी मिलता है।

कॉन्क्लेव में वक्ताओं ने कहा कि राजस्थान जैसे जल-संकटग्रस्त राज्य में जल पुनः उपयोग आधारित तकनीकें समय की आवश्यकता हैं। LTE जैसी प्रणालियां ताजे जल स्रोतों पर निर्भरता कम कर पर्यावरण संरक्षण के साथ औद्योगिक स्थिरता को भी मजबूती प्रदान कर सकती हैं।

उल्लेखनीय है कि पाली राजस्थान का एक प्रमुख टेक्सटाइल हब है, जहां 800 से अधिक डाइंग एवं प्रिंटिंग इकाइयां संचालित हैं। औद्योगिक अपशिष्ट के कारण पाली लंबे समय तक देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में गिना जाता रहा है। अधिकांश इकाइयां ‘रेड कैटेगरी’ में आती हैं और पूर्व में बांडी नदी में अनुपचारित अपशिष्ट प्रवाह के मामले भी सामने आ चुके हैं।

कॉन्क्लेव में शामिल प्रतिभागियों ने एकमत से कहा कि उन्नत एवं प्रमाणित तकनीकों को अपनाकर टेक्सटाइल इकाइयां न केवल पर्यावरणीय नियमों का पालन कर सकती हैं, बल्कि दीर्घकाल में उत्पादन क्षमता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। विशेषज्ञों ने इसे पाली के टेक्सटाइल उद्योग के लिए एक सकारात्मक और आवश्यक पहल बताया।

Rajasthan Today

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