मैत्री और क्षमा का भाव जीवन में आ जाए तो मानव जीवन का कल्याण निश्चित : अमृत मुनि

पाली : रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे पर्यूषण पर्व के तहत गुरुवार को तीसरे दिन को मैत्री दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर धर्मसभा में संतों ने श्रद्धालुओं को मैत्री, क्षमा, तप, त्याग, संयम और आत्मचिंतन का संदेश दिया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर संतों के प्रवचनों का श्रवण किया।
उप पर्वतक अमृत मुनि ने मैत्री दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि जीवन में मैत्री और क्षमा का भाव आ जाए तो व्यक्ति के साथ-साथ समाज का भी कल्याण हो सकता है। उन्होंने कहा कि दूसरों के प्रति मैत्री भाव रखना आसान नहीं है, लेकिन यही भाव जीवन को सार्थक दिशा देता है।
उन्होंने कहा कि पर्यूषण पर्व आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का अवसर है। इस दौरान दिन-दुखी और जरूरतमंद जीवों के प्रति करुणा एवं क्षमा का भाव रखना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से तपस्या कर रहे साधकों की अनुमोदना करने का आह्वान करते हुए कहा कि तप की अनुमोदना करना भी पुण्य का माध्यम है।
अमृत मुनि ने कहा कि धर्म को सही अर्थों में समझने के लिए जीवन में मैत्री का भाव होना जरूरी है। जब मन में मैत्री आती है तो व्यक्ति का बोलना और सामने वाले का सुनना दोनों सार्थक हो जाते हैं।
उन्होंने भगवान कृष्ण के जीवन का संदर्भ देते हुए मैत्री के महत्व को समझाया और कहा कि जीवन में सच्ची मित्रता का भाव पैदा करना कठिन जरूर है, लेकिन इसके परिणाम अत्यंत कल्याणकारी होते हैं।

मैत्री दिवस के अवसर पर गुरुदेव सुकन मुनि ने दो परम मित्रों हीरालाल और मोतीलाल की प्रेरक कथा सुनाई। दोनों मित्रों में गहरी मित्रता थी और वे जीवन के हर सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ रहते थे। दोनों ने अपने बच्चों का विवाह भी कराया।
कथा के माध्यम से उन्होंने बताया कि परिवार में रिश्तों के बीच सम्मान और मैत्री का भाव किस तरह पूरे परिवार के वातावरण को बदल सकता है। हीरालाल की बहू जब विवाह के बाद घर आई तो उसने परिवार के सभी सदस्यों का सम्मान किया, लेकिन घर की बुजुर्ग दादी के प्रति उपेक्षा का व्यवहार देखकर उसे पीड़ा हुई।
बहू ने अपनी मां के पास जाकर सवाल किया कि उसे ऐसे घर में क्यों भेजा गया, जहां बुजुर्ग महिला का सम्मान नहीं होता। बाद में वह अपने पति के साथ ससुराल लौटी और घर की चाबियां एवं दहेज का सामान सास को सौंप दिया। उसने किसी से विवाद करने के बजाय बुजुर्ग दादी की सेवा करने का संकल्प लिया।
धीरे-धीरे उसके व्यवहार का असर परिवार पर पड़ा और बुजुर्ग दादी की स्थिति सुधरने लगी। हीरालाल अपनी बहू के व्यवहार से बेहद खुश हुआ। इस कथा के माध्यम से सुकन मुनि ने समझाया कि सच्ची मैत्री केवल मित्रों के बीच ही नहीं, बल्कि परिवार के प्रत्येक रिश्ते में सम्मान और संवेदना के रूप में दिखाई देनी चाहिए।
इससे पूर्व साध्वी संयम सुधा जी ने अपने प्रवचन में समय के महत्व को समझाते हुए कहा कि समय को कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने कहा कि व्यक्ति हवा और पानी को कुछ हद तक रोक सकता है, लेकिन समय को रोकना किसी के बस में नहीं है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति समय की कद्र करता है, समय भी उसे लाभ पहुंचाता है। आज मनुष्य संपत्ति और धन अर्जित करने के लिए दिन-रात भाग रहा है, लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि धन से अधिक महत्वपूर्ण उसका जीवन और आत्मकल्याण है।
साध्वी ने कहा कि समुद्र कितना भी विशाल क्यों न हो, नदियों का पानी लगातार उसमें गिरता रहता है, फिर भी समुद्र खाली नहीं होता। इसी तरह धन का लालच भी कभी समाप्त नहीं होता। व्यक्ति धन और माया के पीछे भागता रहता है, लेकिन अंततः शरीर साथ छोड़ देता है और धन यहीं रह जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मसंयम का संदेश देते हुए कहा कि अपनी इच्छाओं और मन को नियंत्रित करना जरूरी है। जीवन में यह भाव आ जाए कि मेरी वजह से किसी को तकलीफ न हो और मैं किसी दूसरे की वस्तु नहीं लूंगा, तो व्यक्ति सच्चे अर्थों में महावीर के सिद्धांतों का अनुयायी बन सकता है।
धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने भगवान कृष्ण के जीवनकाल से जुड़ी दक्ष कुमार की दीक्षा की विस्तृत कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि सांसारिक लालच और मोह के बावजूद दक्ष कुमार ने दीक्षा का मार्ग चुना।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में विश्वास पैदा करना सीखना चाहिए। जो व्यक्ति संत और धर्म से दिल से जुड़ता है, वही सच्चे अर्थों में श्रावक कहलाता है। केवल किसी संघ या संस्था से जुड़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धर्म के प्रति मन से जुड़ाव होना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भगवान नेमी नाथ और भगवान महावीर की दृष्टि जिस पर पड़ी, उसने धर्म के मार्ग को अपनाकर मोक्ष की ओर कदम बढ़ाया। साधु बनना आसान नहीं है। संत अकेला नहीं होता, उसके पीछे उसके गुरु और पूरी साधना परंपरा का मार्गदर्शन होता है।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि सच्ची मैत्री वही होती है जो कठिन समय में भी साथ निभाए और जरूरत पड़ने पर व्यक्ति को सही मार्ग दिखाए। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी माता सहित परिवार के बुजुर्गों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव रखने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जब मन में क्षमा और मैत्री का भाव जागृत होता है तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को पर्यूषण पर्व के दौरान आत्मचिंतन और संयम को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री प्रकाश कटारिया ने तपस्या करने वाले साधकों की बारंबार अनुमोदना की। उन्होंने तप और साधना के मार्ग पर चल रहे तपस्वियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
वहीं बाहर से आए अतिथियों एवं भक्तगणों का अध्यक्ष पदम चंद ललवानी द्वारा स्वागत किया गया। धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचनों का श्रवण कर मैत्री, क्षमा और आत्मसंयम के संदेश को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
पर्यूषण पर्व के इस आयोजन में धर्म, तप और आत्मचिंतन के साथ मैत्री एवं क्षमा का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया। संतों ने श्रद्धालुओं को समझाया कि बाहरी सुख-सुविधाओं की बजाय मन की शुद्धि, दूसरों के प्रति सद्भाव और आत्मसंयम ही जीवन को वास्तविक अर्थों में सार्थक बनाते हैं।



