
पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान शुक्रवार को वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की ओर से दीक्षार्थी बहन रिक्षिता सिंघवी का श्रद्धा और सम्मान के साथ स्वागत किया गया। इस अवसर पर संतों के प्रवचन हुए तथा संघ के सदस्यों ने दीक्षार्थी का चुनरी ओढ़ाकर एवं श्रीफल भेंट कर बहुमान किया। कार्यक्रम में दीक्षा के निर्णय की अनुमोदना करते हुए संघ की ओर से उनके संयम मार्ग के लिए मंगलकामनाएं व्यक्त की गईं।
प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने समय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिन लोगों में धर्म के प्रति रुचि होती है, वे प्रवचन में समय पर पहुंचते हैं, जबकि रुचि नहीं रखने वाले लोग देर से आते हैं। उन्होंने कहा कि समय किसी के लिए रुकता नहीं है।
उन्होंने ट्रेन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह ट्रेन का समय निश्चित होता है और देर होने पर ट्रेन छूट जाती है, उसी प्रकार जीवन में भी समय का ध्यान रखना आवश्यक है। समय को टालने की आदत व्यक्ति के लिए नुकसानदायक हो सकती है।

डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र के प्रसंग के माध्यम से क्षमा और धैर्य के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि राजा हरिश्चंद्र समय पर राजसभा में पहुंचकर अपना राजकाज करते थे और उनकी प्रजा भी उनसे प्रसन्न थी। एक दिन ऋषि विश्वामित्र उनकी सभा में पहुंचे। दोनों के बीच काफी वाद-विवाद हुआ और अंततः विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से उनका राज्य और राजमुकुट दान में मांग लिया।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि राजा हरिश्चंद्र ने बिना क्रोध किए अपनी बात पर सहमति जताई। उनके भीतर क्षमा और सहनशीलता का भाव था। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति में क्षमा की क्षमता होती है, वह सामने वाले के क्रोध का भी सामना कर सकता है और अपने व्यवहार से उसके क्रोध को शांत करने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि राजा हरिश्चंद्र की आगे की कथा भी इसी प्रसंग से जुड़े जीवन मूल्यों को सामने रखती है।
डॉ. वरुण मुनि ने दीक्षार्थी रिक्षिता सिंघवी का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की बेटियां अपने जीवन को लेकर अलग-अलग सपने देखती हैं। कई बेटियां अपने माता-पिता से अपनी पसंद के जीवनसाथी के बारे में बात करती हैं, लेकिन यहां एक ऐसी बेटी आई है, जिसके मन में वैराग्य का भाव जागा है।
उन्होंने कहा कि रिक्षिता ने अपने गुरु की आज्ञा और परिवार की सहमति लेकर संयम के मार्ग पर जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय आत्मकल्याण और आध्यात्मिक साधना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इस अवसर पर गुरुदेव सुकून मुनि ने कहा कि जिनवाणी अमर है और भगवान महावीर ने भी अपने गुरु से जिनवाणी सुनकर उसे जीवन में उतारा। उन्होंने कहा कि दीक्षार्थी बहन यहां दीक्षा के लिए आशीर्वाद लेने पहुंची हैं।
उन्होंने कहा कि वैराग्य के कई रूप हो सकते हैं और कई बार व्यक्ति का वैराग्य कुछ समय के लिए भी होता है, लेकिन वास्तविक वैराग्य आत्मा के भीतर से उत्पन्न होता है और व्यक्ति स्वयं अपने मार्ग का चयन करता है।
उन्होंने बताया कि रिक्षिता सिंघवी महासती साध्वी सुप्रभा के सानिध्य में रहकर संयम एवं साधना के मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं। दीक्षार्थी रिक्षिता सिंघवी की माता का नाम लता सिंघवी और पिता का नाम पारसमल सिंघवी है। वे मूल रूप से ब्यावर निवासी हैं और वर्तमान में कोयंबटूर में निवासरत हैं। पाली संघ की ओर से उनकी दीक्षा के लिए 11 फरवरी 2027 का मुहूर्त निकाला गया है।

मंत्री प्रकाश कटारिया ने दीक्षार्थी बहन रिक्षिता सिंघवी का पाली आगमन पर स्वागत करते हुए कहा कि उनका यह निर्णय आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि वीर प्रभु की जिनवाणी के माध्यम से वे स्वयं के साथ-साथ समाज के लोगों के कल्याण की दिशा में भी प्रेरणा का माध्यम बनेंगी।
उन्होंने कहा कि वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की ओर से दीक्षार्थी के संयम मार्ग की अनुमोदना की जाती है और उनके उज्ज्वल आध्यात्मिक जीवन के लिए मंगलकामना की जाती है।
कार्यक्रम के दौरान संघ के अध्यक्ष पदमचंद डलवानी, श्री संघ सभा के अध्यक्ष सज्जन राज गुलेचा, महेंद्र जैन, केवल चंद कवाड़, नरेंद्र पच सहित संघ के सदस्यों तथा त्रिशला महिला मंडल की सदस्यों ने दीक्षार्थी रिक्षिता सिंघवी का चुनरी ओढ़ाकर और श्रीफल भेंट कर बहुमान किया। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने दीक्षा के निर्णय की अनुमोदना करते हुए उनके संयम मार्ग के लिए मंगलकामनाएं व्यक्त कीं।
कार्यक्रम में दीक्षार्थी रिक्षिता सिंघवी ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि संयम का अर्थ संसार से भागना नहीं है। संयम का वास्तविक अर्थ अपने भीतर को जानना और राग-द्वेष को शांत करने का प्रयास करना है।

उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए व्यक्ति अनेक प्रकार की इच्छाओं, मोह और आसक्ति से जुड़ जाता है। इन कारणों से आत्मा पर भार बढ़ता जाता है। संसार की कोई भी बाहरी वस्तु आत्मा के इस भार को दूर नहीं कर सकती। आत्मशुद्धि के लिए भीतर की साधना और संयम आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि संयम का मार्ग आत्मा को जानने, भीतर की अशुद्धियों को दूर करने और आध्यात्मिक शांति की ओर बढ़ने का मार्ग है। कार्यक्रम में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने दीक्षार्थी के भावों को श्रद्धा के साथ सुना और उनके आगामी संयम जीवन के लिए शुभकामनाएं दीं।
चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान आयोजित इस स्वागत एवं अनुमोदना समारोह में धार्मिक वातावरण बना रहा। संतों के प्रवचन, दीक्षार्थी के भाव और संघ की ओर से किए गए सम्मान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।



