google.com, pub-3021598506696014, DIRECT, f08c47fec0942fa0
Paliदेशब्रेकिंग न्यूज़राजस्थानराज्य

जिद और स्वार्थ समाज के अच्छे काम में बनते हैं बाधा : डॉ. वरुण मुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत मंगलवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने समाज और परिवार के जीवन में जिद, स्वार्थ, छल-कपट तथा अहंकार से बचने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपनी जिद पर अड़ा रहता है और केवल निजी स्वार्थ को प्राथमिकता देता है, वह कई बार समाज के अच्छे कार्यों में भी बाधा बन जाता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि ऐसे लोगों से अनावश्यक विवाद करने के बजाय उनसे दूरी बनाए रखना ही उचित है, जो लगातार नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं। छल-कपट और गलत तरीके से किया गया कार्य अंततः व्यक्ति की निंदा का कारण बनता है।

डॉ. वरुण मुनि ने प्रवचन के दौरान राजा हरिश्चंद्र की कथा को आगे बढ़ाते हुए विश्वामित्र और हरिश्चंद्र के प्रसंग के माध्यम से सत्य, त्याग और अहंकार के परिणामों को समझाया।

उन्होंने बताया कि राजा हरिश्चंद्र के साथ हुए व्यवहार को लेकर अयोध्या की जनता में नाराजगी थी। लोगों ने मिलकर एक टीम बनाई और विश्वामित्र के पास पहुंचकर कहा कि हरिश्चंद्र की बकाया स्वर्ण मुद्रा वे मिलकर दे देंगे, लेकिन हरिश्चंद्र को अयोध्या में ही रहने दिया जाए।

प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि व्यक्ति जब क्रोध और अहंकार में निर्णय लेता है तो कई बार स्वयं ही परिस्थितियों में फंस जाता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति सत्य का सम्मान करता है, वह केवल तपस्या करने वाले व्यक्ति से भी बड़ा हो सकता है।

प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि जीवन में यदि दुख का समय आया है तो वह हमेशा नहीं रहता। समय बदलता है और परिस्थितियां भी बदलती हैं। इसलिए कठिन दौर में व्यक्ति को धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने राजा हरिश्चंद्र के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य और वैभव छूट जाने के बाद भी उनके साथ उनकी पत्नी तारा और पुत्र रोहित थे। व्यक्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव में यह समझ आता है कि वास्तव में कौन अपना है और कौन पराया।

उन्होंने कहा कि जीवन की वास्तविक पूंजी रिश्तों, संस्कारों और अच्छे कर्मों में होती है। बाहरी वैभव परिस्थितियों के साथ बदल सकता है, लेकिन अच्छे कर्म और सत्य के प्रति आस्था व्यक्ति की पहचान बनाते हैं।

इससे पूर्व साध्वी प्रीति सुधा ने प्रवचन में धन-संपत्ति के प्रति अत्यधिक मोह को लेकर श्रद्धालुओं को चेताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य धन कमाने और संपत्ति बढ़ाने के पीछे इतना अधिक भागने लगता है कि उसे यह याद ही नहीं रहता कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है।

उन्होंने कहा कि दुनिया की बड़ी से बड़ी संपत्ति भी व्यक्ति के साथ नहीं जाती। मृत्यु के समय धन-दौलत यहीं रह जाती है और व्यक्ति के साथ उसके कर्म तथा धर्म ही जाते हैं। इसके बावजूद मनुष्य जीवनभर संपत्ति को अपने साथ ले जाने की मानसिकता में लगा रहता है।

साध्वी प्रीति सुधा ने एक सेठ-सेठानी का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि सेठानी नियमित रूप से प्रवचन सुनने जाती थी, जबकि सेठ धन कमाने में व्यस्त रहता था। सेठ का लक्ष्य था कि उसके पास मौजूद बड़ी रकम और बढ़े।

कथा के माध्यम से बताया गया कि गुरु ने सेठ को जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझाने के लिए एक आध्यात्मिक अनुशासन अपनाने को कहा। कई दिनों तक व्रत, संयम और धार्मिक साधना के बाद सेठ को यह एहसास कराया गया कि जिस धन को वह जीवनभर जमा करता रहा, वह अंततः उसके साथ नहीं जाने वाला।

कथा का संदेश यह था कि धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन धन को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेना व्यक्ति को अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर कर देता है। धर्म, संयम और अच्छे कर्म ही जीवन की वास्तविक पूंजी हैं।

चातुर्मास कार्यक्रम में विभिन्न स्थानों से गुरु भक्त दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए पहुंचे। इस दौरान चेन्नई से आए ज्ञानचंद बेलड़ा का स्वागत करवाया गया। मंत्री प्रकाश कटारिया ने संघ अध्यक्ष पदमचंद ललवानी के माध्यम से उनका स्वागत कराया।

वहीं भीलवाड़ा से आई महिला मंडल का पाली महिला मंडल की ओर से स्वागत किया गया। धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचन सुने और धर्मलाभ लिया।

चातुर्मास प्रवचन के दौरान संतों ने श्रद्धालुओं को धन-मोह से ऊपर उठकर धर्म, सत्य, संयम और सद्कर्मों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।

Rajasthan Today

Related Articles

Back to top button