पुरुषार्थ करने वाला व्यक्ति जीवन में कुछ भी हासिल कर सकता है : सुकनमुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत शुक्रवार को गुरुदेव सुकनमुनि ने श्रद्धालुओं को पुरुषार्थ, पराक्रम और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने मनुष्य को जीवन को पवित्र बनाने के लिए उद्योगशील, पराक्रमी और पुरुषार्थी बनने की प्रेरणा दी है। जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, व्यक्ति को प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए।
प्रवचन के दौरान उन्होंने साधना और तप के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अधिक से अधिक धार्मिक तप और साधना करने का प्रयास करे। नवकारसी, कोरसी, नीवी और उपवास जैसी तपस्याओं के माध्यम से आत्मसंयम एवं आध्यात्मिक अनुशासन को मजबूत किया जा सकता है।
सुकनमुनि ने कहा कि मनुष्य जन्म से सब कुछ नहीं जानता। जीवन में वह धीरे-धीरे सीखता है। माता-पिता से प्रारंभिक संस्कार और जीवन की आवश्यक बातें सीखता है, शिक्षा के दौरान मित्रों और समाज से अनेक अनुभव प्राप्त करता है तथा मेहनत और पुरुषार्थ के माध्यम से आगे बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति में सीखने और आगे बढ़ने की इच्छा हो तो वह कठिन से कठिन लक्ष्य हासिल कर सकता है। इसके लिए निराश होने के बजाय लगातार प्रयास करना जरूरी है।

गांधी जयंती के अवसर का उल्लेख करते हुए गुरुदेव सुकनमुनि ने महात्मा गांधी के जीवन को भगवान महावीर की वाणी और सत्य के सिद्धांतों से जोड़कर समझाया। उन्होंने कहा कि गांधीजी के जीवन में सत्य की शक्ति प्रमुख थी। उन्होंने सत्याग्रह के माध्यम से देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
उन्होंने कहा कि सत्य के मार्ग पर चलना आसान नहीं होता, लेकिन दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकता है। गांधीजी के जीवन से सत्य, अहिंसा और दृढ़ इच्छाशक्ति की प्रेरणा ली जा सकती है।
प्रवचन के क्रम को आगे बढ़ाते हुए डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र की कथा के माध्यम से सत्य और वचन पालन का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य वचन की रक्षा के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया और अपने वचन से पीछे नहीं हटे।
कथा प्रसंग के अनुसार विश्वामित्र को दी जाने वाली दक्षिणा के लिए हरिश्चंद्र के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। वे काशी में काम की तलाश करते रहे, लेकिन तत्काल कोई काम नहीं मिला। इसी दौरान उन्होंने अपनी पत्नी रानी तारा से भी परिस्थिति साझा की।
डॉ. वरुण मुनि ने कथा के माध्यम से बताया कि आर्थिक संकट बढ़ने के बावजूद राजा हरिश्चंद्र सत्य के मार्ग से हटने को तैयार नहीं हुए। रानी तारा ने भी उन्हें कठिन समय में हिम्मत रखने के लिए प्रेरित किया।
कथा में जब विश्वामित्र ने दक्षिणा चुकाने के लिए हरिश्चंद्र पर दबाव बनाया तो हरिश्चंद्र ने अपना वचन पूरा करने का संकल्प दोहराया। उन्होंने अपने सूर्यवंशी होने और सत्य वचन का पालन करने की बात कही। कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया गया कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, सत्य और सिद्धांतों का त्याग नहीं करना चाहिए।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि आगम परंपरा में ऐसे अनेक महापुरुषों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने अपने जीवन को सत्य, संयम और सिद्धांतों के लिए समर्पित किया। उनके जीवन प्रसंग आज भी समाज को प्रेरणा देते हैं।

प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने श्रावक प्रीतमजी बोहरा के जीवन में किए गए पुरुषार्थ और उनके योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि निरंतर प्रयास और पुरुषार्थ के माध्यम से व्यक्ति समाज में अपनी पहचान बना सकता है।
चातुर्मास कार्यक्रम में विभिन्न स्थानों से पहुंचे श्रद्धालुओं एवं अतिथियों का भी स्वागत किया गया। संघ के उपमंत्री होशियार राज मेहता की ओर से इचलकरंजी, बेंगलुरु, अजमेर और मद्रास सहित विभिन्न स्थानों से आए अतिथियों का स्वागत करवाया गया।
कार्यक्रम में उप प्रवर्तक अमृतमुनि, महेश मुनि, साध्वी प्रीति सुधा एवं साध्वी संयम ज्योति सहित साधु-साध्वी वृंद विराजमान रहे। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने प्रवचन का श्रवण किया।
चातुर्मास प्रवचन में पुरुषार्थ, तप, सत्य और वचन पालन जैसे विषयों के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन में सकारात्मकता, आत्मसंयम और दृढ़ संकल्प अपनाने का संदेश दिया गया।



