
पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत डॉ. वरुण मुनि ने जीवन, मृत्यु, त्याग और धर्म के महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है, लेकिन मनुष्य जीवनभर सांसारिक मोह-माया और दुनियादारी में उलझा रहता है। ऐसे में जरूरी है कि व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा दे, बुरी आदतों का त्याग करे और अच्छे विचारों तथा सद्कर्मों को अपनाए।
प्रवचन के दौरान उन्होंने भगवान महावीर की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को केवल जीवन जीने की कला ही नहीं, बल्कि मृत्यु की अनिवार्यता को समझते हुए अपने वर्तमान जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास भी करना चाहिए। उन्होंने श्रोताओं को आत्मचिंतन, धर्म आराधना और समय के सदुपयोग के लिए प्रेरित किया।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि मनुष्य अपने जीवन में धन, परिवार और सांसारिक उपलब्धियों को लेकर अनेक योजनाएं बनाता है, लेकिन मृत्यु कब आएगी, यह कोई नहीं जानता। शरीर में बीमारी आने पर व्यक्ति को जीवन की अनिश्चितता का एहसास होता है, इसलिए स्वस्थ रहते हुए ही धर्म और आत्मकल्याण की दिशा में प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल प्रवचन सुनना नहीं, बल्कि अपने जीवन को व्यवस्थित बनाना है। व्यक्ति को अपनी कमजोरियों को पहचानकर बुरी आदतें छोड़नी चाहिए और अच्छे गुणों को जीवन में स्थान देना चाहिए। आत्मसुधार की शुरुआत स्वयं से होती है और इसके लिए निरंतर प्रयास जरूरी हैं।
प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने त्याग और सांसारिक मोह के विषय पर कहा कि कई बार व्यक्ति किसी वस्तु या संबंध को छोड़ने के बाद भी मन से उससे जुड़ा रहता है। उन्होंने संतों के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन्होंने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर धर्म का मार्ग अपनाया, उनके त्याग को समझना चाहिए, न कि छोड़ी गई वस्तुओं के प्रति मोह बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने राजा हरिश्चंद्र के प्रसंग का उल्लेख करते हुए त्याग, धैर्य और कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन व्यक्ति को अपने विवेक और मूल्यों को नहीं छोड़ना चाहिए।

डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र, रानी तारा और उनके पुत्र रोहित की कथा सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य की भावनाएं और सांसारिक अपेक्षाएं उसकी परीक्षा लेती हैं।
कथा के अनुसार, रानी तारा को अपने पुत्र रोहित से उम्मीद थी कि वह बड़ा होकर उनके दुख दूर करेगा और कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालने में सहारा बनेगा। एक दिन रोहित जंगल में फल लेने गया। वहां उसे एक पेड़ के नीचे फल मिला, जिसे खाने के बाद उसने अपनी मां के लिए भी फल ले जाने का विचार किया। वह दूसरे पेड़ पर चढ़ने लगा, तभी वहां एक नाग आ गया और उसे डस लिया। रोहित बेहोश होकर गिर पड़ा और उसके मुंह से मां तारा का नाम निकला।
जब रानी तारा को पुत्र के बारे में सूचना मिली तो वह व्याकुल होकर जंगल पहुंचीं और बेटे को सीने से लगाकर विलाप करने लगीं। कथा के माध्यम से मुनि ने बताया कि संसार में मनुष्य अनेक संबंधों और अपेक्षाओं के सहारे जीवन बिताता है, लेकिन परिस्थितियां हमेशा उसकी इच्छा के अनुसार नहीं चलतीं।
उन्होंने श्रोताओं को संदेश दिया कि दूसरों से अत्यधिक अपेक्षाएं रखने के बजाय व्यक्ति को आत्मबल बढ़ाना चाहिए और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि सांसारिक जीवन में संबंधों का अपना महत्व है, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर हो जाना उचित नहीं है। व्यक्ति को अपने जीवन की जिम्मेदारियों को समझना चाहिए और आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने भगवान महावीर की शिक्षाओं के अनुरूप आत्मचिंतन, संयम और धर्म आराधना पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जीवन और शरीर दोनों अनिश्चित हैं, इसलिए समय रहते अच्छे कार्य करने चाहिए और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने चतुर्दशी के अवसर पर अधिक से अधिक श्रावक-श्राविकाओं से प्रतिक्रमण में शामिल होने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि आत्मनिरीक्षण और प्रतिक्रमण के माध्यम से व्यक्ति अपने आचरण पर विचार कर सकता है तथा गलतियों से सीख लेकर जीवन में सुधार कर सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि मानमल जी बाफना की ओर से प्रभावना का आयोजन किया जाएगा। साथ ही आगामी अमावस्या के पाक्षिक पर्व पर भी अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से प्रतिक्रमण करने की अपील की गई। कार्यक्रम से पूर्व साध्वी प्रीति सुधा जी ने भी धर्मसभा को संबोधित किया। इस दौरान महेश मुनि, अखिलेश मुनि और साध्वी संयम ज्योति विराजमान रहे।
चातुर्मास कार्यक्रम में विभिन्न स्थानों से आए श्रावक-श्राविकाओं का स्वागत भी किया गया। मंत्री प्रकाश कटारिया ने पुष्कर से आए श्रावक-श्राविकाओं, विमला जी गुगलिया, महिला मंडल, शुभराज जी, शांतिलाल जी आनंदपुर कालू तथा चेन्नई निवासी मानिकचंद सहित अन्य श्रद्धालुओं का स्वागत किया। संघ की ओर से मानमल जी बाफना और भगवान सिंघवी ने भी स्वागत-सत्कार में सहभागिता निभाई। इसके अतिरिक्त बीजापुर संघ से आए गौतम चंद चोपड़ा और सौभाग्य चंद का भी स्वागत किया गया।
चातुर्मास प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन की अनिश्चितता, सांसारिक मोह, त्याग और आत्मबल के महत्व को समझाया गया। डॉ. वरुण मुनि ने धर्म को व्यवहार में उतारने, अपनी कमियों को पहचानने और जीवन को सदाचार से जोड़ने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में आगामी अमावस्या के पाक्षिक पर्व को ध्यान में रखते हुए श्रद्धालुओं से प्रतिक्रमण और धर्म आराधना में अधिकाधिक सहभागिता निभाने का आह्वान किया गया।



