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पाली चातुर्मास प्रवचन: ‘लोभ की चाह रखने वाला व्यक्ति जीवन में उन्नति नहीं कर सकता’, डॉ. वरुण मुनि ने दिया ईमानदारी और दान का संदेश

पाली : शहर के श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत मंगलवार को डॉ. वरुण मुनि जी महाराज ने भगवान महावीर के अंतिम संदेश के आठवें अध्ययन पर प्रवचन देते हुए लोभ, लालच और अनावश्यक संग्रह से दूर रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के मन में लगातार अधिक पाने की कामना बनी रहती है, वह जीवन में वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता। मनुष्य को अपनी जरूरत के अनुसार ही उपार्जन करना चाहिए और कमाई में ईमानदारी, व्यवहार में सच्चाई तथा जीवन में दान की भावना बनाए रखनी चाहिए।

धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने कपिलदेव मुनि की कथा के माध्यम से बताया कि किस तरह लोभ से मुक्त होकर व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। वहीं, प्रवर्तक गुरुदेव सुकन मुनि जी महाराज ने भगवान महावीर की वाणी को जीवन में उतारने और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा दी।

डॉ. वरुण मुनि जी महाराज ने कहा कि जीवन में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कमाना जरूरी है, लेकिन जरूरत से अधिक पाने की इच्छा व्यक्ति को लोभ के रास्ते पर ले जाती है। उन्होंने व्यापार में ईमानदारी का महत्व समझाते हुए कहा कि कमाई का आधार उचित मूल्य और सही व्यवहार होना चाहिए। अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति व्यक्ति की प्रतिष्ठा और जीवन दोनों को प्रभावित कर सकती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि कोई व्यक्ति कम कीमत के सामान को अनुचित तरीके से बहुत अधिक कीमत पर बेचता है, तो इससे उसका व्यवहार और व्यापार दोनों प्रभावित होते हैं। गलत तरीके से कमाया गया धन स्थायी सुख नहीं दे सकता। इसके विपरीत ईमानदारी से अर्जित धन व्यक्ति को आत्मसंतोष और सम्मान प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को केवल अपनी तिजोरी भरने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। अपनी कमाई का कुछ हिस्सा जरूरतमंदों की सहायता और समाजसेवा में लगाना भी जरूरी है। जीवन का उद्देश्य केवल संग्रह करना नहीं, बल्कि दूसरों के काम आना भी होना चाहिए।

प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने कपिलदेव मुनि की जीवन यात्रा का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जीवन में कठिन परिस्थितियों, संघर्षों और मोह के बीच फंसा व्यक्ति भी सही ज्ञान प्राप्त होने पर अपनी दिशा बदल सकता है। कपिलदेव मुनि के जीवन में भी अनेक उतार-चढ़ाव आए। कथा के अनुसार, उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया और एक समय चोरी के आरोप में भी उलझ गए।

बाद में सत्य का बोध होने और ज्ञान जागृत होने पर उनके जीवन में परिवर्तन आया। उन्होंने लोभ और सांसारिक मोह से दूर होकर दीक्षा ग्रहण की। पूर्व जन्म से जुड़ी घटनाओं का ज्ञान होने पर उन्होंने अपने साथियों को भी सही मार्ग की प्रेरणा दी। कथा में बताया गया कि उनके उपदेश से 500 चोरों ने भी जीवन बदलकर साधु जीवन अपनाया।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि इस प्रसंग का संदेश है कि व्यक्ति को लोभ में फंसे रहने के बजाय उससे बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए। सही ज्ञान, आत्मचिंतन और संयम से जीवन में बदलाव संभव है।

डॉ. वरुण मुनि ने जैन परंपरा में दान, सेवा और दूसरों की सहायता के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पहले घरों में अतिथि और जरूरतमंदों के लिए अतिरिक्त भोजन बनाने की परंपरा थी। लोग अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों के लिए भोजन और सहायता की व्यवस्था रखते थे।

उन्होंने कहा कि जीवन में केवल अपनी जरूरतों तक सीमित रहने के बजाय दूसरों के लिए भी स्थान रखना चाहिए। दान की भावना से समाज में सहयोग, संवेदना और सद्भाव बढ़ता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों की मदद करें और संग्रह की प्रवृत्ति के स्थान पर उदारता को अपनाएं।

उन्होंने यह भी समझाया कि धन और संपत्ति यहीं रह जाने वाले हैं, इसलिए जीवन रहते अच्छे कर्म, दान और सेवा के कार्य करने चाहिए।

प्रवर्तक गुरुदेव सुकन मुनि जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन में आने वाले धार्मिक पर्व और साधना के अवसर व्यक्ति को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हैं। मनुष्य को संसार की उलझनों में भटकने के बजाय ज्ञान, संयम और गुरु के मार्गदर्शन से जीवन को सही दिशा देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल प्रवचन सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसमें बताए गए विचारों को अपने आचरण में उतारना आवश्यक है। भगवान महावीर की वाणी को जीवन में अपनाकर व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक साधना, जप और संयम के माध्यम से जीवन को बेहतर बनाने का संदेश दिया।

धर्मसभा में गुरुदेव सुकन मुनि जी महाराज ने अगले दिन आचार्य सम्राट भुधर जी महाराज की जन्म जयंती के अवसर पर श्रद्धालुओं से विशेष धार्मिक साधना करने का आह्वान किया। साथ ही डॉ. वरुण मुनि जी महाराज की जन्म जयंती एवं दीक्षा दिवस के उपलक्ष्य में भी श्रद्धालुओं को सामायिक और एकासना करने की प्रेरणा दी गई।

इस दौरान सभी श्रद्धालुओं को सामूहिक पच्चक्खाण दिलाया गया। गुरुदेव ने धार्मिक अवसरों का लाभ उठाते हुए संयम, तप और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया।

चातुर्मास प्रवचन में बेंगलुरु, लूणी, बगड़ी नगर, मेड़ता सिटी, अहमदाबाद और उदयपुर सहित विभिन्न स्थानों से गुरु भक्त शामिल हुए। मंत्री प्रकाश कटारिया ने अगले दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रम की जानकारी दी।

बेंगलुरु और लूणी से आए छगनलाल एवं ओमप्रकाश लूणावत का मंत्री पदमचंद ललवानी ने स्वागत किया। बेंगलुरु से आईं माता चंद्रकांता लूणावत का लालचंद लूकड़ ने अभिनंदन किया। मेड़ता सिटी से ज्ञानचंद जी, अहमदाबाद से राजेंद्र जी तथा उदयपुर से आए मीठालाल एवं दयालाल का भी संघ की ओर से स्वागत किया गया।

प्रवचन सुनने के लिए वरिष्ठ नागरिक समिति के डॉ. रामलाल मोहबारसा, नरपत सिंह कुंपावत और दिनेश दवे सहित अन्य सदस्य भी पहुंचे। कार्यक्रम में बाहर से आए गुरु भक्तों और अतिथियों का अभिवादन करते हुए धार्मिक आयोजनों में सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया गया।

धर्मसभा का मुख्य संदेश यही रहा कि लोभ और अनावश्यक संग्रह से दूर रहकर ईमानदारी, दान, संयम तथा सदाचार को अपनाना ही जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है।

Rajasthan Today

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