पाली में महर्षि वाल्मीकि के जीवन दर्शन पर हुआ व्याख्यान, वक्ताओं ने रामायण को बताया लोकमंगल और सामाजिक समरसता का महाकाव्य

पाली : अखिल भारतीय साहित्य परिषद एवं कल्पवृक्ष साहित्य सेवा संस्थान, पाली के संयुक्त तत्वावधान में आशापुरा नगर स्थित पं. विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी सभागार में युगदृष्टा महाकवि महर्षि वाल्मीकि के जीवन दर्शन पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने महर्षि वाल्मीकि के साहित्यिक योगदान, रामायण के व्यापक सामाजिक सरोकारों और भारतीय संस्कृति में उनके महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने रामायण को लोकमंगल की भावना, सामाजिक समरसता और जनकल्याण के आदर्शों से परिपूर्ण महाकाव्य बताया।
कार्यक्रम में शिक्षाविद् राजेन्द्र सिंह भाटी मुख्य अतिथि रहे, जबकि साहित्यकार पवन पाण्डेय ने अध्यक्षता की। आयोजन में साहित्यप्रेमियों और उपस्थितजनों ने महर्षि वाल्मीकि के विचारों तथा उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता पर चर्चा की।
जिलाध्यक्ष भंवरसिंह राठौड़ चोटिला ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ महर्षि वाल्मीकि के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया। इसके बाद कवि मनीष कुमार अनैतिक ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। व्याख्यान के दौरान वक्ताओं ने महर्षि वाल्मीकि के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए रामायण में निहित सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को रेखांकित किया।
मुख्य अतिथि शिक्षाविद् राजेन्द्र सिंह भाटी ने कहा कि युगदृष्टा महाकवि वाल्मीकि ने लोकमंगल की उदात्त भावना से प्रेरित होकर महाकाव्य रामायण की रचना की। उनकी रचनाओं में उदात्त संस्कृति के साथ लोक संस्कृति के तत्व भी स्वाभाविक रूप से समाहित हैं। यही कारण है कि रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज और जनजीवन के विविध पक्षों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के साहित्यिक योगदान को स्मरण करते हुए उनकी रचनाओं में निहित लोककल्याण की भावना को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार पवन पाण्डेय ने कहा कि महाकवि वाल्मीकि ने रामायण में सामाजिक जीवन की व्यापक दृष्टि प्रस्तुत की है। उनके अनुसार, भगवान श्रीराम राजपुत्र होते हुए भी जनमानस के अंतर्मन में स्थान बनाने वाले जननेता के रूप में सामने आते हैं। रामायण में वर्णित आदर्श और जीवन मूल्य समाज को मर्यादा, कर्तव्य तथा जनकल्याण की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि रामायण के पात्र और उनके जीवन प्रसंग भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़े हुए हैं।
व्याख्यान के दौरान अन्य वक्ताओं ने भी महर्षि वाल्मीकि की रचनाओं में निहित सामाजिक समरसता और सर्वहित की भावना पर विचार रखे।
कवि दिलीप बच्चानी ने रामायण को लोकजीवन का महाकाव्य बताया। मांगूसिंह दूदावत ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि की रामायण सामाजिक समरसता की भावना से ओतप्रोत है। वहीं रामसिंह गोहिल ने भगवान श्रीराम के चरित्र को सर्वसुलभ, सर्वहितकारी और समदर्शी बताया।
कवि प्रकाश पिड़वा ने कहा कि वाल्मीकि रचित रामायण की महत्वपूर्ण विशेषता इसके व्यापक सामाजिक सरोकार हैं। इसमें समाज के विभिन्न पक्षों को समाहित करते हुए जनजीवन से जुड़े मूल्यों को प्रमुखता दी गई है।
कार्यक्रम में महर्षि वाल्मीकि के साहित्यिक अवदान के साथ-साथ रामायण में वर्णित आदर्शों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर भी विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने उनके जीवन दर्शन और साहित्य को भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विरासत बताते हुए समाज में इन मूल्यों के प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर भगाराम गुर्जर, विष्णुकुमार सोलंकी, सुदर्शन सिंह उदावत, राकेश सोलंकी, योगेश परमार, शब्बीर खान सहित अन्य साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।



