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पटाखों से होने वाली जीव हिंसा से बचें, बच्चों को भी दें अहिंसा की सीख : साध्वी प्रीतिसुधा

पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मास कार्यक्रम के तहत शनिवार को साध्वी प्रीतिसुधा, डॉ. वरुण मुनि एवं गुरुदेव अमृत मुनि ने धर्मसभा को संबोधित किया। प्रवचन के दौरान दीपावली पर पटाखे फोड़ने से होने वाली जीव हिंसा, आठ प्रकार के कर्मों के बंधन, भगवान महावीर के समवसरण, आत्मज्ञान और लेश्या के प्रभाव सहित विभिन्न धार्मिक विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।

साध्वी प्रीतिसुधा ने अपने प्रवचन में बताया कि जीव अपने कर्मों के कारण संसार में बंधता है। उन्होंने आठ प्रकार के कर्म बंधन की व्याख्या करते हुए कहा कि पटाखे जलाने से केवल ध्वनि और प्रकाश ही नहीं फैलता, बल्कि अनेक जीवों को पीड़ा भी पहुंचती है। पटाखों के कारण हजारों जीवों की हिंसा होती है। कई लोग जीवों के पीछे पटाखे बांधकर उन्हें सताते हैं और कष्ट पहुंचाते हैं, जो अनुचित है।

उन्होंने कहा कि दीपावली पर पटाखों की रोशनी देखने और उनकी आवाज सुनने के बजाय अपना मन परमात्मा की भक्ति में लगाना चाहिए। पटाखे फोड़ने में लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन जरूरतमंद गरीब व्यक्ति को दस रुपये देने में भी लोग पीछे हट जाते हैं। यह सोच बदलने की आवश्यकता है।

साध्वी ने कहा कि आजकल कई लोग हाथ में पटाखे फोड़ते हैं और घायल होने के बाद पछताते हैं। ऐसे में स्वयं सावधानी बरतने के साथ बच्चों को भी समझाना चाहिए कि उत्सव के नाम पर किसी जीव को कष्ट न पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए और पाप कर्मों का बोझ बढ़ाने के बजाय पुण्य कार्यों की ओर अग्रसर होना चाहिए। तभी दीपावली का पर्व वास्तविक अर्थों में सार्थक होगा।

इसके बाद डॉ. वरुण मुनि ने भगवान महावीर के समवसरण का वर्णन करते हुए कहा कि सामान्यतः तीर्थंकर भगवान का समवसरण एक घंटे तक चलता है, लेकिन भगवान महावीर का समवसरण 48 घंटे तक चला था। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर का व्यक्तित्व और उनकी वाणी ऐसी थी कि हिंसक स्वभाव वाले जीव भी उनके सान्निध्य में वैर भाव छोड़कर एक साथ बैठते थे और प्रवचन सुनते थे। भगवान की देशना से मन का वैर समाप्त हो जाता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रत्येक दिन को जीवन का अंतिम दिन मानकर जीना चाहिए तथा अपने भीतर क्षमा और समता का भाव विकसित करना चाहिए। मन में चलने वाले संताप और अहंकार को दूर करना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपने भीतर से ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव को कम कर आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ता है, तभी वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति संभव होती है।

डॉ. वरुण मुनि ने आगे 33वें अध्ययन में कर्मगति के विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जीव आठ प्रकार के कर्मों के कारण संसार में उलझा रहता है। काम, क्रोध, लोभ और मोह कर्म बंधन के प्रमुख कारण हैं। मन, वचन और काया की प्रवृत्तियों पर संयम स्थापित करने से कर्मों के बंधन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

उन्होंने 34वें अध्ययन ‘लेश्या’ का उल्लेख करते हुए बताया कि व्यक्ति के भीतर जैसे भाव होते हैं, उसका प्रभाव उसके व्यवहार और व्यक्तित्व में भी दिखाई देता है। लेश्या का संबंध व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और विचारों से है। यदि मन में अच्छे भाव होंगे तो उनका प्रभाव बाहरी आचरण में भी दिखाई देगा। व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए।

धर्मसभा के दौरान गुरुदेव अमृत मुनि ने उपवास करने वाले श्रावक-श्राविकाओं को प्रत्याख्यान दिलाए। संघ के मंत्री प्रकाश कटारिया ने बताया कि वर्तमान में श्रद्धालुओं के तेले के उपवास चल रहे हैं। तपस्या के माध्यम से श्रावक-श्राविकाएं धर्म आराधना और आत्मसंयम का परिचय दे रहे हैं।

कार्यक्रम में भीलवाड़ा से आए बाफना परिवार का श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की ओर से सम्मान किया गया। परिवार द्वारा जीवन में किए गए विभिन्न कार्यों और योगदान के लिए संघ ने उनका अभिनंदन किया। कार्यक्रम में तेले के उपवास की प्रभावना बादल देवी, कल्पेश जी एवं नवरत्न जी पगारिया परिवार की ओर से रखी गई। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।

Rajasthan Today

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