पर्यूषण पर्व पर “वाणी संयम दिवस” : साध्वी काव्यलता ने दिया जीवनोपयोगी संदेश

पाली : पर्यूषण पर्व के पावन अवसर पर आयोजित “वाणी संयम दिवस” कार्यक्रम में आचार्य महाश्रमण की सुशिष्या साध्वी काव्यलता ठाणा-4 ने अपने मार्मिक उद्बोधन से साधक-साधिकाओं को जीवनोपयोगी संदेश प्रदान किए। कार्यक्रम की शुरुआत साध्वी काव्यलता के मुखारविंद से नवकार मंत्र के उच्चारण से हुई। युवक परिषद के सदस्यों ने मंगलाचरण प्रस्तुत कर कार्यक्रम को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की।
साध्वी सुरभिप्रभा ने कहा – “वाणी एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा हम समस्या भी खड़ी कर सकते हैं और समाधान भी। कम बोलने वाला व्यक्ति सदैव ज्ञान-मार्ग में अग्रसर रहता है। विवेक यही है कि कहाँ बोलना है और कहाँ मौन रखना है।” उन्होंने यह भी बताया कि आचार्य महाश्रमण जी नपे-तुले शब्दों में उत्तर देते हैं, लेकिन उनके दर्शन मात्र से ही हर व्यक्ति गदगद हो उठता है।

साध्वी काव्यलता ने जैन आगम में तप की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि तप को मंगल माना गया है। उन्होंने श्राविका चंपा की कथा सुनाई, जिन्होंने मासखमण की तपस्या कर बादशाह अकबर तक को प्रभावित किया। साध्वी ने स्पष्ट किया कि – “तप के 12 प्रकार बताए गए हैं, जिनमें ऊणोदरी तप (कम खाना) छोटा होते हुए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। द्रव्य ऊणोदरी – आहार में संयम और भाव ऊणोदरी – क्रोध, मान, माया, लोभ को कम करना है।”
साध्वी ने भगवान महावीर के तीसरे भव मरीचि कुमार की कथा सुनाते हुए बताया कि अभिमान और असंयम साधना के मार्ग में बाधक हैं।
उन्होंने कहा – “आज कई भाई-बहन आठ दिन का मौन व्रत करते हैं। मौन रहने से वचन सिद्धि प्राप्त होती है और जीवन में शांति बनी रहती है। आज के समय में जब कोई किसी की बात सुनना नहीं चाहता, तब वाणी संयम और भी आवश्यक हो जाता है।”
साध्वी काव्यलता के प्रेरणादायी मार्गदर्शन में सभी साधक-साधिकाओं ने दो घंटे का मौन व्रत धारण किया। कार्यक्रम का समापन मंगलपाठ के साथ हुआ, जिसमें सभी श्रोतागण भाव-विभोर हो उठे।



