मन को आत्मा के पक्ष में मोड़ें, मोक्ष का मार्ग होगा प्रशस्त : साध्वी प्रीति सुधा

पाली : रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के अंतर्गत शनिवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा में साध्वी प्रीति सुधा ने श्रद्धालुओं को कर्म सिद्धांत, संयम और आत्मशुद्धि का महत्व समझाते हुए कहा कि व्यक्ति के सुख-दुख और जीवन की परिस्थितियों के लिए किसी दूसरे को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को समझना चाहिए। वहीं डॉ. वरुण मुनि ने मन, शरीर और आत्मा के बीच संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि मन को आत्मा के अनुकूल बनाकर ही व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी प्रीति सुधा ने कहा कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों और परिणामों के पीछे व्यक्ति के कर्मों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को दोष देने के बजाय अपने कर्मों का आत्मावलोकन करना चाहिए।
उन्होंने संयम और दीक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संयम का मार्ग अत्यंत कठिन और जिम्मेदारीपूर्ण है। इसके लिए जीवन में आत्मशुद्धि, अनुशासन और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। उन्होंने श्रावकों-श्राविकाओं को अपने आचरण और विचारों को निर्मल बनाने तथा धार्मिक जीवन के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का संदेश दिया।

साध्वी ने कहा कि जब तक व्यक्ति मोहनीय कर्मों के प्रभाव में रहता है, तब तक उसका मन अनेक प्रकार के भ्रम और आकर्षण में उलझा रहता है। आत्मसंयम एवं सदाचार के माध्यम से इन बंधनों को कमजोर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव की वाणी को यदि व्यक्ति अपने जीवन में उतार ले और अच्छे कर्मों को अपनाए तो जीवन का मार्ग स्वतः सुधरने लगता है।
धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने आत्मा, शरीर और मन के स्वरूप को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने आत्मा के स्वरूप को समझने और अपने भीतर झांकने का मार्ग दिखाया। आत्मा मूल रूप से स्वतंत्र है, जबकि शरीर पराधीन है।
उन्होंने कहा कि शरीर को चलने के लिए भोजन, पानी और सांस की आवश्यकता होती है और ये तीनों पूरी तरह मनुष्य के नियंत्रण में नहीं हैं। यदि शरीर की प्रत्येक आवश्यकता मनुष्य के पूर्ण नियंत्रण में होती तो वह स्वयं भगवान बनने की स्थिति में होता। इसलिए शरीर की सीमाओं को समझना आवश्यक है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि शरीर एक ओर और आत्मा दूसरी ओर है, इनके बीच मन की महत्वपूर्ण भूमिका है। मन निरंतर बदलता रहता है और कभी शरीर की सुविधाओं की ओर तो कभी आत्मा की शांति की ओर आकर्षित होता है। यदि मन आत्मा के पक्ष में स्थिर हो जाए तो व्यक्ति मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सकता है, लेकिन यदि मन भौतिक सुख-सुविधाओं में उलझ जाए तो आध्यात्मिक लक्ष्य से भटकने की संभावना बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य के विचार ही उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। बचपन से लेकर जीवन के अंतिम समय तक व्यक्ति की अनेक इच्छाओं और फैसलों के पीछे मन की भूमिका रहती है। इसलिए मन को नियंत्रित करना और उसे सकारात्मक दिशा देना आवश्यक है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि मन को शरीर की सुविधाओं के बजाय आत्मा की शांति, संयम और साधना के पक्ष में मोड़ना चाहिए। जब मन आत्मा के अनुकूल हो जाता है तो अनावश्यक इच्छाएं और भौतिक मांगें कम होने लगती हैं। यही स्थिति व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि धार्मिक कार्यक्रम में जाने के समय भी मन तरह-तरह के बहाने बनाता है, जबकि आत्मा व्यक्ति को समय पर पहुंचकर प्रवचन सुनने और साधना का लाभ लेने के लिए प्रेरित करती है। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति अपने मन की दिशा को पहचानकर उसे सही मार्ग पर ले जाए।
धर्मसभा के दौरान रोजाना की तरह उपवास एवं तपस्या करने वाले तपस्वियों के तप का अनुमोदन किया गया। साधु-साध्वी मंडल के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने तप और संयम के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
इस अवसर पर गुरुदेव सुकन मुनि, उपप्रवर्तक अमृत मुनि, महेश मुनि, अखिलेश मुनि, साध्वी प्रीति सुधा एवं साध्वी स्वयं सुधा सहित साधु-साध्वी मंडल विराजमान रहा।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री प्रकाश कटारिया ने गुरुदेव को नमन करते हुए चातुर्मास कार्यक्रम के तहत आयोजित हो रही धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने श्रद्धालुओं से चातुर्मास के दौरान अधिक से अधिक धार्मिक आयोजनों में सहभागिता करने और संतों के प्रवचनों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।
धर्मसभा के दौरान दोपहर में वंदना कार्यक्रम आयोजित किए जाने की भी जानकारी दी गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और साधु-साध्वी मंडल के प्रवचनों का लाभ लिया।



