‘दूसरों की राय से नहीं, परमात्मा के आदर्शों से जिएं जीवन, तभी मिलेगी सद्गति’

पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत सोमवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने श्रावकों को जीवन में आध्यात्मिकता, आत्मसंयम और मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपना जीवन दूसरों की राय के अनुसार नहीं, बल्कि परमात्मा के आदर्शों को सामने रखकर जीना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीवन में अपना आदर्श किसे बनाया जाए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति परमात्मा को सामने रखकर अपने कर्म करता है और उनके सिद्धांतों के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करता है, उसका जीवन सही दिशा में आगे बढ़ता है और उसे सद्गति का मार्ग प्राप्त होता है। वहीं जो व्यक्ति हर कदम पर चार लोगों की राय लेकर अपना जीवन चलाता है, उसका जीवन भी दूसरों की राय के अनुरूप बिखरता चला जाता है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि संसार की सभी भौतिक वस्तुएं नश्वर हैं। मिट्टी से बनी वस्तु अंततः मिट्टी में ही मिल जाती है। व्यक्ति के पास यदि भीतर का आध्यात्मिक वैभव नहीं है तो बाहर का धन-दौलत और भौतिक संपन्नता भी उसे स्थायी सुख नहीं दे सकती।
उन्होंने भगवान महावीर के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पास बाहरी रूप से कुछ भी नहीं था। देह पर एक वस्त्र तक था, वह भी लोगों ने ले लिया, लेकिन उनके भीतर आध्यात्मिक वैभव इतना विशाल था कि उसके सामने दुनिया का हर भौतिक वैभव छोटा पड़ जाता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने भीतर की संपदा बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। आध्यात्मिक रूप से समृद्ध व्यक्ति छोटी-छोटी परिस्थितियों में विचलित नहीं होता और कठिन समय में भी अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखता है।

प्रवचन में मानसिक संतुलन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि व्यक्ति को हर परिस्थिति में अपने दिमाग को शांत और ठंडा रखना चाहिए। जिसके विचार और मन शांत हैं, वही आध्यात्मिक रूप से मजबूत बन सकता है।
उन्होंने कहा कि कई बार छोटी-छोटी घटनाएं व्यक्ति को क्रोधित कर देती हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति संघ में आए, दान करे और अपेक्षा के अनुरूप उसका स्वागत नहीं हो तो उसका मन खिन्न हो सकता है और वह अपना मानसिक संतुलन खो सकता है। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति को स्वयं पर नियंत्रण रखना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि लोग लाखों रुपए खर्च कर अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए एसी लगाते हैं, लेकिन अपने दिमाग को शांत और ठंडा रखने के लिए क्या प्रयास करते हैं?
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि क्रोध व्यक्ति की विवेक शक्ति को समाप्त कर देता है। गुस्से में व्यक्ति ऐसी हरकत कर बैठता है, जिसका बाद में उसे पछतावा होता है। उन्होंने कहा कि क्रोध में लोग टीवी और मोबाइल तक तोड़ देते हैं, लेकिन वास्तविक नुकसान वस्तुओं का नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वयं के मन और संस्कारों का होता है।
उन्होंने कहा कि दिमाग को कभी कोयले की भट्टी नहीं बनने देना चाहिए। यदि व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकता तो उसका बाहरी ज्ञान और उपदेश भी प्रभावी नहीं हो सकता। आध्यात्मिक जीवन की पहली आवश्यकता अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करना है।
प्रवचन में उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि उसे अपने कपड़ों की अधिक चिंता है या अपनी आत्मा की। कपड़ों पर लगा दाग धोकर मिटाया जा सकता है, लेकिन आत्मा पर लगे संस्कारों और कर्मों के दाग को मिटाना आसान नहीं होता।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की मति और उसके कर्म ही उसकी आगे की गति निर्धारित करते हैं। इसलिए मनुष्य जीवन को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं में खर्च करने के बजाय आत्मकल्याण की दिशा में लगाना चाहिए।

इसके बाद गुरुदेव सुकन मुनि ने उपस्थित श्रावकों को संबोधित करते हुए जिनवाणी और गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। उन्होंने परम श्रद्धेय श्री रघुनाथ मुनि महाराज एवं मरुधर केसरी मिश्रीमल जी महाराज के चरणों में नमन करते हुए कहा कि जिनवाणी और प्रभु वाणी का श्रवण व्यक्ति के जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि काम, क्रोध, लोभ और मोह व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने वाले प्रमुख विकार हैं। इनमें क्रोध ऐसा विकार है, जो व्यक्ति के विवेक और संबंधों दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए क्रोध को शांत करना और उस पर विजय प्राप्त करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने क्रोध को जीत लेता है, वह वास्तव में अपने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई जीत लेता है। ऐसा व्यक्ति न केवल स्वयं का जीवन बेहतर बनाता है, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बनता है।
चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान मंच पर प्रवर्तक अमृत मुनि महाराज, महेश मुनि, अखिलेश मुनि, साध्वी प्रीति सुधा एवं साध्वी संयम ज्योति विराजमान रहे। संतों के सानिध्य में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने प्रवचन का लाभ लिया।
कार्यक्रम में संघ अध्यक्ष पदमचंद ललवानी, मंत्री प्रकाश कटारिया, गिरीश काकरिया, महेंद्र जैन, हुक्मीचंद संचेती सहित संघ के पदाधिकारी एवं श्रद्धालु मौजूद रहे। धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचनों को ध्यानपूर्वक सुना और आत्मसंयम, क्रोध नियंत्रण तथा आध्यात्मिक जीवन अपनाने का संदेश ग्रहण किया।



