google.com, pub-3021598506696014, DIRECT, f08c47fec0942fa0
Paliदेशब्रेकिंग न्यूज़राजस्थानराज्य

पर्यूषण पर्व का सातवां दिन ‘संभाव दिवस’ के रूप में मनाया, संतों ने दिया समभाव और क्षमाभाव का संदेश

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास एवं पर्यूषण पर्व के सातवें दिन धार्मिक वातावरण के बीच ‘संभाव दिवस’ मनाया गया। धर्मसभा में संतों ने श्रद्धालुओं को जीवन में समभाव, पवित्र विचार, संयम, स्वाध्याय और क्षमाभाव अपनाने का संदेश दिया। इस दौरान भगवान ऋषभदेव आदिनाथ के जीवन प्रसंगों सहित विभिन्न धार्मिक एवं प्रेरक प्रसंगों का वाचन किया गया। साथ ही पर्यूषण पर्व के दौरान कठिन तपस्या करने वाले तपस्वियों का बहुमान भी किया गया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि आज का दिन समभाव दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यदि व्यक्ति के जीवन में समभाव आ जाए तो जीवन का कल्याण संभव है। उन्होंने कहा कि मन में अच्छे और पवित्र विचार रखने तथा सभी के प्रति समान भाव रखने से जीवन का उद्धार हो सकता है। सुकन मुनि ने इस अवसर पर भीका जाट के चरित्र का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में सद्भाव, संयम और अच्छे संस्कारों को अपनाने की प्रेरणा दी।

सुकन मुनि ने बताया कि आज पन्नालाल जी महाराज की जन्म जयंती भी है। उन्होंने कहा कि पन्नालाल जी महाराज का संघ के प्रति विशेष स्नेह और समर्पण रहा। उन्होंने स्वाध्याय की प्रेरणा दी और छात्रावास खुलवाने जैसे सेवा कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि ऐसे महापुरुषों को सच्चे भाव से याद करते हुए उनके बताए मार्ग को अपने जीवन में अपनाएं। उनके विचारों और सेवा भावना से प्रेरणा लेकर जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।

पर्यूषण पर्व के समापन की ओर बढ़ते हुए सुकन मुनि ने श्रद्धालुओं को उपवास और खमत-खामणा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि पर्यूषण केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और आपसी क्षमा का पर्व है। सभी श्रद्धालुओं को इस अवसर का लाभ उठाते हुए मन, वचन और कर्म से क्षमा भाव अपनाना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को एक-दूसरे से खमत-खामणा करने का संदेश देते हुए पर्व की आध्यात्मिक भावना को जीवन में उतारने का आह्वान किया।

इससे पूर्व डॉ. वरुण मुनि ने कल्पसूत्र वाचन पूर्ण किया। उन्होंने धार्मिक प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भगवान ऋषभदेव आदिनाथ के जीवन और जैन परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों की जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि समय के साथ बच्चों के स्वभाव में भी बदलाव आया है। पहले के समय में बच्चे सरल स्वभाव के होते थे और आसानी से समझ जाते थे, जबकि वर्तमान समय में बच्चों में जिद और अधीरता बढ़ती दिखाई देती है। उन्होंने संस्कारों और संयम के महत्व पर जोर देते हुए अभिभावकों से बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करने की अपील की।

डॉ. वरुण मुनि ने धर्मसभा में भगवान ऋषभदेव आदिनाथ से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने कालचक्र की अवधारणा और जैन धर्म में मोक्ष से संबंधित मान्यताओं पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने भगवान ऋषभदेव द्वारा गन्ने के रस का आहार ग्रहण करने से जुड़े प्रसंग का उल्लेख किया और बताया कि इसी घटना से अक्षय तृतीया की धार्मिक परंपरा का संबंध माना जाता है। इसके बाद राजा भरत चक्रवर्ती और अन्य महापुरुषों के प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म, त्याग और तपस्या का महत्व समझाया।

पर्यूषण पर्व के दौरान तपस्या करने वाले श्रद्धालुओं के सम्मान का क्रम भी जारी रहा। धर्मसभा में आठ उपवास सहित विभिन्न प्रकार की तपस्या करने वाले पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का बहुमान किया गया। तपस्वियों के प्रति श्रद्धालुओं ने सम्मान और अनुमोदना व्यक्त की।

मंत्री प्रकाश कटारिया ने भी धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पर्यूषण पर्व की आध्यात्मिक महत्ता और तपस्या के महत्व पर विचार रखे। संघ की ओर से सभी तपस्वियों और श्रद्धालुओं का अभिनंदन किया गया।

संघ की ओर से घोषणा की गई कि आठ उपवास और उससे अधिक कठिन तपस्या करने वाले तपस्वियों का विशेष बहुमान किया जाएगा। इससे तपस्या करने वाले श्रद्धालुओं का उत्साह बढ़ा और धर्मसभा में उपस्थित लोगों ने तपस्वियों के प्रति अनुमोदना व्यक्त की।

पर्यूषण पर्व के सातवें दिन आयोजित धर्मसभा में संतों के प्रवचनों का मुख्य संदेश समभाव, संयम, स्वाध्याय, तपस्या और क्षमा रहा। संतों ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि पर्व के दौरान प्राप्त धार्मिक संदेश केवल धर्मसभा तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन में भी उतारा जाए।

Rajasthan Today

Related Articles

Back to top button