बाहर की दौड़ थमेगी तो भीतर का ज्ञान जागेगा : डॉ. वरुण मुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान सोमवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने श्रद्धालुओं को संसार की मोह-माया से दूरी बनाकर आत्मज्ञान की ओर बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य बाहरी दुनिया की दौड़ में उलझा रहता है, तब तक वह अपने भीतर के ज्ञान को पहचान नहीं पाता। जब बाहर की दौड़ थमती है, तभी भीतर का ज्ञान जागृत होता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में यह तय करना चाहिए कि उसे वास्तव में क्या चाहिए। यदि सामने स्वयं भगवान महावीर आकर कुछ मांगने का अवसर दें, तो मनुष्य शायद यह भी तय नहीं कर पाएगा कि क्या मांगे। इसलिए जीवन में आत्मचिंतन और सही दिशा का होना जरूरी है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि संसार की भौतिक उपलब्धियों के पीछे लगातार भागते रहने से मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप और आत्मिक शांति से दूर होता जाता है। जीवन में कुछ समय ऐसा होना चाहिए, जब व्यक्ति बाहरी गतिविधियों से हटकर स्वयं के भीतर झांके और अपने कर्मों तथा व्यवहार का मूल्यांकन करे। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म और गुरु की शिक्षाओं को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखने, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने का आह्वान किया।
प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र और उनकी रानी की कथा के माध्यम से दांपत्य जीवन में सुख-दुख के साथ और त्याग की भावना को समझाया। उन्होंने बताया कि जब राजा हरिश्चंद्र ने अपना राजपाट दान कर दिया और दक्षिणा देने की स्थिति सामने आई, तब उन्हें अयोध्या छोड़कर जाना पड़ा।
राजा ने जब अपनी पत्नी को परिस्थितियों के बारे में बताया और कहा कि आगे जीवन कैसे चलेगा, यह भी निश्चित नहीं है, तब रानी ने उनका साथ छोड़ने के बजाय उनके साथ चलने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि विवाह केवल सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए होता है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि व्यक्ति का वास्तविक परिचय उसके वैभव के समय नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में होता है। जब धन-दौलत और सुविधाएं समाप्त हो जाएं और तब भी जीवनसाथी साथ खड़ा रहे, तो यही वास्तविक दांपत्य सहयोग है।

उन्होंने कहा कि बेटियों में ऐसे संस्कार विकसित किए जाने चाहिए कि वे अपने ससुराल में भी परिवार के सुख-दुख में सहभागी बनें। इसी तरह पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे के प्रति सहयोग और सम्मान की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने पारिवारिक विवादों को घर की चारदीवारी से बाहर नहीं ले जाने की बात कही। उनका कहना था कि घर की छोटी-छोटी बातों को बढ़ाने के बजाय आपसी बातचीत और समझदारी से समाधान करना चाहिए। परिवार में शांति और आपसी सहयोग जीवन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की पहचान विपरीत परिस्थितियों में होती है। जब जीवन में संकट आता है, तब मित्र और जीवनसाथी के सहयोग का वास्तविक महत्व सामने आता है।
डॉ. वरुण मुनि ने श्रद्धालुओं को नकारात्मक परिस्थितियों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की सीख दी। उन्होंने कहा कि जीवन में कठिनाइयां आती रहती हैं, लेकिन व्यक्ति को उनसे घबराने के बजाय उनमें छिपे अनुभव और सीख को समझना चाहिए।
उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, विश्वास और त्याग बनाए रखना व्यक्ति के जीवन को नई दिशा देता है।
इसके बाद गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि जीवन का कल्याण तभी संभव है, जब गुरु की शिक्षा को सही रूप में समझकर उसे आचरण में उतारा जाए। भगवान महावीर की वाणी को जीवन में उतारने से व्यक्ति को सही दिशा मिल सकती है।
उन्होंने एक कहानी के माध्यम से समझाया कि सही शिक्षा और सही तरीके से किए गए कार्य का परिणाम भी सही मिलता है। व्यापार में लाभ हो या जीवन में सफलता, कई बार अंतर केवल समझ और कार्य करने के तरीके का होता है।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति जीवन में कभी रास्ता भटक जाए तो उसे गुरु की शरण में जाना चाहिए। गुरु का ज्ञान और मार्गदर्शन व्यक्ति के जीवन को सार्थक दिशा प्रदान कर सकता है।
इससे पूर्व साध्वी प्रीति सुधा ने प्रवचन में जीवन के अंधकार को दूर कर ज्ञान प्राप्त करने के उपाय बताए। उन्होंने कहा कि सही ज्ञान मिलने पर व्यक्ति अपने जीवन की दिशा को समझ सकता है और आत्मकल्याण की ओर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म और ज्ञान को जीवन का आधार बनाने तथा आत्मचिंतन के माध्यम से अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया।
चातुर्मास कार्यक्रम में विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में गुरु भक्त दर्शन एवं प्रवचन श्रवण के लिए पहुंचे। इस दौरान चेन्नई, राणावास, बेंगलुरु, सादड़ी सहित विभिन्न स्थानों से आए गुरु भक्तों का स्वागत किया गया।
मंत्री प्रकाश कटारिया ने संघ के अध्यक्ष पदमचंद ललवानी के साथ महेंद्र जैन, संपतलाल एवं केवलचंद जी के माध्यम से बाहर से आए गुरु भक्तों का स्वागत करवाया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचन सुने और धर्मलाभ लिया।
चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान संतों द्वारा दिए जा रहे प्रवचनों में आत्मज्ञान, गुरु भक्ति, पारिवारिक संस्कार, त्याग, संयम और सकारात्मक जीवन दृष्टिकोण पर जोर दिया जा रहा है।



