
पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत मंगलवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने सेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सेवा मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। किसी जरूरतमंद, माता-पिता अथवा गुरु की निस्वार्थ सेवा करने से जीवन में पुण्य और संतोष की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को ऐसी सेवा करनी चाहिए, जिससे उसका भौतिक जीवन भी सार्थक बने और आत्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त हो।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने गुरु और समाज की सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। सेवा का मार्ग आसान नहीं है। जो व्यक्ति वास्तव में सेवा करता है, उसे कई बार समाज की आलोचना भी सुननी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में सेवा से ज्यादा उसका दिखावा देखने को मिलता है। संतों के सामने कुछ और और वास्तविक जीवन में कुछ और व्यवहार करने के बजाय व्यक्ति को अपने आचरण में सेवा का भाव अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई साध्वियां और बहुएं ऐसी रही हैं, जिन्होंने परिवार और समाज की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। इसके विपरीत कुछ लोग घर में अपने बुजुर्गों की सेवा नहीं करते और बाहर जाकर धर्म की बातें करते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म केवल बोलने का विषय नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि व्यक्ति को अपने माता-पिता और गुरु की सेवा में पूरी तरह समर्पित रहना चाहिए। बुजुर्ग अवस्था में व्यक्ति फिर से बचपन जैसी स्थिति में पहुंच जाता है और उसे अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में उनकी सेवा करना संतान और समाज का दायित्व है।
उन्होंने कहा कि संपन्न माता-पिता अथवा किसी समर्थ व्यक्ति की सेवा करने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन वास्तविक सेवा वही है, जिसमें गरीब और सामान्य व्यक्ति की भी उसी भावना से सेवा की जाए।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि यदि सेवा करने के पीछे किसी लाभ या बदले की अपेक्षा है तो वह सच्ची सेवा नहीं कही जा सकती। निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही वास्तविक सेवा है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति किसी लाभ की उम्मीद में सेवा करता है, वह सेवा के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाया। वहीं जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के सेवा करता है, उसका जीवन सार्थक हो जाता है। उन्होंने निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले लोगों को प्रणाम करते हुए सेवा को जीवन का श्रेष्ठ मार्ग बताया।
धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र और उनकी पत्नी तारा के प्रसंग के माध्यम से सत्य, त्याग और सेवा की भावना को समझाया। उन्होंने बताया कि सत्य के पालन के कारण हरिश्चंद्र और तारा को कठिन परिस्थितियों में दास-दासी का जीवन जीना पड़ा और उन्हें दूसरों की सेवा करनी पड़ी।
प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। कथा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कुएं पर पानी लेने के प्रसंग और हरिश्चंद्र-तारा के मिलने की स्थिति तक का वर्णन किया। कथा के आगे के प्रसंग को आगामी धर्मसभा में विस्तार से बताया जाएगा।
इसके बाद गुरुदेव सुकनमुनि ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मचिंतन का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को दूसरों के कर्मों और व्यवहार को देखने के बजाय पहले अपने भीतर झांकना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति स्वयं को आईने में नहीं देखता, तब तक उसे अपने वास्तविक स्वरूप और कमियों का पता नहीं चलता। इसी प्रकार जीवन में आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि वह स्वयं क्या कर रहा है और उसके कर्म किस दिशा में जा रहे हैं।
सुकनमुनि ने कहा कि आगम की वाणी व्यक्ति को जीवन का सही मार्ग दिखाती है। जिसके भीतर बोध और ज्ञान का अभाव है, उसके जीवन में वास्तविक कल्याण का मार्ग कठिन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य को भगवान महावीर की वाणी और उनके बताए मार्ग का सान्निध्य नहीं मिलता, तब तक मोह-माया से बाहर निकलकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझना कठिन होता है।
सुकनमुनि ने कहा कि आगामी नवरात्रि और दशहरा पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन को बेहतर बनाने के अवसर भी हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से इन पर्वों का आध्यात्मिक लाभ उठाने और अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया।
धर्मसभा के पश्चात मंत्री प्रकाश कटारिया ने बाहर से आए अतिथियों का संघ सदस्यों की ओर से स्वागत करवाया। इस दौरान खेरवा निवासी पुष्पराज काठेड़, प्रमोद गांधी, चेन्नई-जवाली से आए एम. दिनेश कुमार सहित अन्य अतिथियों का स्वागत किया गया।
अतिथियों के स्वागत में शरबत जी पगारिया सहित संघ के सदस्य मौजूद रहे। चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचनों का श्रवण कर सेवा, सत्य, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जीवन के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया।



