
पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान गुरुदेव सुकनमुनि ने श्रद्धालुओं को दान-पुण्य, त्याग, वैराग्य और आत्मकल्याण का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में अधिक से अधिक दान-पुण्य करना चाहिए और आत्मा के कल्याण के लिए निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। सांसारिक भोग-विलास और मोह-माया से दूरी बनाकर त्यागमय जीवन अपनाना आत्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण मार्ग है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने कर्मों के प्रभाव, जीवदया, साधु जीवन की मर्यादा और आत्मचिंतन की आवश्यकता पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि जीवन में किए गए कर्मों का फल भोगना पड़ता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण और व्यवहार के प्रति सजग रहना चाहिए।
गुरुदेव सुकनमुनि ने कहा कि भिक्षु हो या संन्यासी, उसके जीवन में त्याग, वैराग्य और आत्मचिंतन का भाव होना चाहिए। भोग-विलास का त्याग करके ही व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है। साधु जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक संबंधों से दूर होना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और कल्याण के लिए निरंतर साधना करना है।
उन्होंने आचार्य रघुनाथ और मरुधर केसरी जैसे संतों का स्मरण करते हुए कहा कि जिन्होंने अपना जीवन सेवा और धर्म के कार्यों में समर्पित किया, उन्हें समाज आज भी श्रद्धा से याद करता है। ऐसे संतों का जीवन त्याग, सेवा और समर्पण की प्रेरणा देता है।
इससे पूर्व डॉ. वरुण मुनि ने अपने प्रवचन में गुरु और साधु के व्यक्तित्व तथा उनकी वाणी के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सामान्य व्यक्ति की कही हुई बात का प्रभाव उतना नहीं पड़ता, जितना गुरु के मार्गदर्शन का पड़ता है। जैन परंपरा में साधु की वाणी प्रभावशाली तभी बनती है, जब उसके विचार, आचरण और आत्मा में शुद्धता हो।
उन्होंने कहा कि साधु वही है, जिसने घर-परिवार सहित सांसारिक मोह-माया का त्याग कर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया हो। गुरु के पास जाते समय सांसारिक रिश्तों के बजाय गुरु-शिष्य के संबंध और श्रद्धा के भाव को प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे मन में समर्पण और प्रेम की भावना विकसित होती है।

डॉ. वरुण मुनि ने आत्मचिंतन की महत्ता बताते हुए कहा कि व्यक्ति को स्वयं से कुछ महत्वपूर्ण सवाल करने चाहिए। मैं कौन हूं, मैं कैसा हूं और मैं कहां हूं? इन प्रश्नों के माध्यम से व्यक्ति अपनी वास्तविक स्थिति और आत्मिक दिशा को समझ सकता है।
उन्होंने कहा कि शरीर को ही अपना संपूर्ण परिचय मान लेना उचित नहीं है। मनुष्य को अपनी अंतरात्मा में झांककर यह विचार करना चाहिए कि उसका आचरण कैसा है, उसकी सोच सही दिशा में है या नहीं और कहीं वह गलत मान्यताओं अथवा विचारों में तो नहीं उलझा हुआ है।
उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण के लिए आत्मनिरीक्षण आवश्यक है। व्यक्ति जब अपने भीतर झांककर कमियों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी वह आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
प्रवचन में साधु जीवन की मर्यादाओं और संयम पर भी प्रकाश डाला गया। डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि साधु का जीवन निवृत्ति, अनुशासन और आत्मसाधना पर आधारित होता है। भगवान महावीर के संदेश के अनुरूप पहले स्वयं की आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए, इसके बाद दूसरों के हित के लिए कार्य करना चाहिए।
उन्होंने संयमित जीवनशैली अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति को खान-पान, व्यवहार, परिचय और हंसी-मजाक सहित दैनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं में मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। सीमित और संतुलित आहार तथा संयमित व्यवहार साधना के मार्ग को मजबूत बनाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान गुरुदेव सुकनमुनि ने उपवास और आमलिक करने वाले श्रद्धालुओं को पचक्खान दिलाया। इस अवसर पर धार्मिक साधना में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। चातुर्मास कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित प्रवचन में आत्मशुद्धि, संयम और धार्मिक अनुशासन के महत्व को रेखांकित किया गया।
सभा के दौरान मंत्री प्रकाश कटारिया ने भीलवाड़ा से आए गुरु भक्त सुरेंद्र जी, दिनेश जी, नितेश जी और मुकेश जी का परिचय कराया। संघ की ओर से अध्यक्ष प्रदमचंद ललवानी, संपत जी और धनराज काटेड़ ने उनका स्वागत किया।
इस दौरान कांतिलाल जी धोखा परिवार की स्वर्गीय पत्नी पुष्पा देवी को भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। वे गुरु भक्त थीं। उनके निधन पर गुरुदेव ने उनकी आत्मा की शांति के लिए मंगलकामना की। धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचनों को सुनकर त्याग, संयम, आत्मचिंतन और आत्मकल्याण के संदेश को जीवन में अपनाने की प्रेरणा ली।



