
पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में आयोजित चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान सोमवार को धर्मसभा में साधु-संतों ने श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, विनय, दान और आत्मकल्याण का संदेश दिया। इस अवसर पर डॉ. वरुण मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के 23वें अध्याय में वर्णित केशी कुमार श्रमण और गौतम स्वामी के मिलन का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि विचारों में भिन्नता होने के बावजूद विनय, संवाद और धर्म के प्रति समर्पण से एकता स्थापित की जा सकती है।
डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि भगवान महावीर और भगवान पार्श्वनाथ की परंपरा से जुड़े केशी कुमार श्रमण और गौतम स्वामी एक ही समय में श्रावस्ती नगरी पहुंचे। दोनों अलग-अलग परंपराओं के अनुयायी थे और उनके बाहरी वेश-भूषा एवं पहचान के चिह्न भी अलग थे। नगरी में दोनों के आगमन के बाद लोगों के बीच चर्चा होने लगी कि एक ही धर्ममार्ग पर चलने वाले साधुओं की परंपराएं अलग-अलग क्यों हैं और दोनों एक साथ क्यों नहीं आ सकते।
उन्होंने कहा कि इस प्रसंग से यह सीख मिलती है कि व्यक्ति को बाहरी भिन्नताओं के आधार पर किसी का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति भीतर से कमजोर होता है, वह दूसरों की आलोचना करता है। इसके विपरीत विनय का भाव रखने वाला व्यक्ति संवाद के माध्यम से समाधान खोजता है। केशी कुमार श्रमण और गौतम स्वामी ने एक-दूसरे के विचारों को समझने के लिए मिलकर चर्चा की। इस दौरान नगरवासी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि भगवान महावीर ने पूर्व से चली आ रही कई परंपराओं में आवश्यक परिवर्तन कर साधु-संतों के लिए अनुशासित जीवनशैली और वेश-व्यवस्था का मार्ग बताया। गौतम स्वामी ने आत्मविजय, इंद्रियों पर नियंत्रण, कषायों से मुक्ति और राग-द्वेष का त्याग करने की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य राग-द्वेष और मोह से बंधा रहता है, तब तक उसे वास्तविक शांति नहीं मिल सकती। शुद्ध आचरण, शील और तप जीवन को निर्मल बनाते हैं।

उन्होंने तीर्थंकर भगवान द्वारा बताए गए धर्ममार्ग को जीवन की नौका बताते हुए कहा कि जो व्यक्ति इस मार्ग पर चलता है, वह संसार के मोह और अज्ञान के अंधकार में भटकने से बच सकता है। कथा के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि छोटों को बड़ों के पास जाकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करना चाहिए, वहीं बड़ों का भी कर्तव्य है कि वे छोटों की बात धैर्यपूर्वक सुनकर उचित समाधान दें। विनय और परस्पर सम्मान से ही समाज में एकता मजबूत होती है।
इससे पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने अपने प्रवचन में दान की महत्ता बताते हुए कहा कि कई बार श्रावक गलत स्थान पर दान कर देते हैं, जबकि जरूरतमंद और उचित स्थान तक दान नहीं पहुंच पाता। उन्होंने कहा कि व्यक्ति बाहर से कितना भी सुसज्जित दिखाई दे, लेकिन यदि उसके भीतर धर्म और सद्भावना नहीं है तो उसका जीवन अधूरा है।
उन्होंने कहा कि भगवान की वाणी को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अपने आचरण में उतारना जरूरी है। धर्म की वास्तविक पहचान बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर के भाव, व्यवहार और जीवनशैली से होती है। भगवान की वाणी को जीवन में अपनाने से व्यक्ति को आत्मिक आनंद और शांति की अनुभूति होती है।
गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि जहां संसार में मोह बढ़ता है, वहां पाप की प्रवृत्तियां भी बढ़ती हैं, जबकि जहां भगवान की वाणी का प्रभाव होता है, वहां पाप और विकार दूर होने लगते हैं। उन्होंने दीपावली के अवसर पर धर्म, संयम और आत्मकल्याण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह समय केवल बाहरी उत्सव का नहीं, बल्कि अपने जीवन को पवित्र बनाने का अवसर भी है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म आराधना, सामायिक और संयम को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की वाणी को सुनकर उसके अनुसार आचरण करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
धर्मसभा में आगामी धार्मिक कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया गया कि मंगलवार को मुनि महेश की जन्म जयंती तथा डॉ. अमरीश मुनि की नौवीं पुण्यतिथि मनाई जाएगी। इस अवसर पर श्रद्धालुओं से तीन-तीन सामायिक करने का आह्वान किया गया। मंत्री प्रकाश कटारिया ने भी मुनि महेश की जन्म जयंती और डॉ. अमरीश मुनि की पुण्यतिथि पर सामूहिक रूप से धर्म आराधना करने की बात कही।
उन्होंने बताया कि 4 तारीख को मां सती तेज कंवर जी की पुण्यतिथि भी मनाई जाएगी। श्रद्धालुओं से इन धार्मिक अवसरों पर अधिक से अधिक संख्या में सामायिक एवं धार्मिक क्रियाओं में भाग लेने की अपील की गई।
कार्यक्रम में प्रभावना के लाभार्थी मरुधर केसरी युवा मंडल तथा आकाश नाकिया एवं कांतिलाल जी परिवार की ओर से सहयोग किया गया। चातुर्मास कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।



