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सुमेरपुर में जैविक खेती की अलख: किसान मेले में विशेषज्ञों ने बताया— रसायनों से बिगड़ रही मिट्टी, प्राकृतिक खेती ही भविष्य का रास्ता

पाली। कृषि को लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में सुमेरपुर में शुक्रवार को बड़ा कदम उठाया गया। राजमाता विजयाराजे सिंधिया टाउन हॉल में आयोजित दो दिवसीय किसान मेला एवं प्राकृतिक व जैविक कृषि कार्यशाला का शुभारंभ किसानों के उत्साहपूर्ण सहभाग के साथ हुआ। कार्यशाला में विशेषज्ञों ने किसानों को चेतावनी दी कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से मिट्टी की सेहत लगातार खराब हो रही है, ऐसे में प्राकृतिक और जैविक खेती ही भविष्य की सबसे सुरक्षित और लाभकारी कृषि पद्धति बनकर उभर रही है।

कार्यक्रम का शुभारंभ महेंद्र मेहता, पवन टांक और ताराचंद गोयल ने भूमि माता के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यशाला का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों से जोड़ना, जैविक कृषि को बढ़ावा देना और कृषि क्षेत्र से जुड़ी सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराना रहा।

कार्यशाला में वैज्ञानिक एवं कृषि प्रशिक्षक पवन टांक ने कहा कि अत्यधिक रासायनिक खेती के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति और सूक्ष्म जीवों का संतुलन प्रभावित हो रहा है। इससे उत्पादन क्षमता घटने के साथ-साथ भूमि की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो रही है।

उन्होंने किसानों को मिट्टी की पीएच वैल्यू, कार्बन स्तर और पोषक तत्वों के महत्व की जानकारी देते हुए बताया कि जैविक खेती से भूमि की गुणवत्ता में सुधार होता है और लंबे समय तक बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

कार्यशाला में किसानों को जैविक खाद तैयार करने की विभिन्न तकनीकों की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़, चूना और छाछ आधारित जैविक मिश्रणों, उकालड़ी खाद, कम्पोस्ट खाद और बीज उपचार की विधियों का प्रदर्शन कर किसानों को प्रशिक्षण दिया।

विशेषज्ञों ने बताया कि इन तकनीकों को अपनाकर किसान उत्पादन लागत कम कर सकते हैं और रासायनिक खेती से प्रभावित भूमि को फिर से उपजाऊ बना सकते हैं।

श्रीरामशांताय जैविक कृषि अनुसंधान केंद्र, कोटा के निदेशक ताराचंद गोयल ने कहा कि आज बढ़ रही जीवनशैली संबंधी बीमारियों के पीछे खाद्य उत्पादन में रसायनों का बढ़ता उपयोग भी एक बड़ा कारण है।

उन्होंने कहा कि पहले गांव प्राकृतिक खेती और आत्मनिर्भर व्यवस्था के कारण अधिक स्वस्थ और समृद्ध थे। यदि किसान आधुनिक तकनीक और जैविक पद्धतियों का संतुलित उपयोग करें तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि देश को रोगमुक्त और समृद्ध बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कार्यक्रम में कृषि विभाग सहित विभिन्न विभागों द्वारा किसानों को सरकारी योजनाओं, कृषि नवाचारों और आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। बड़ी संख्या में किसान, पशुपालक और कृषि क्षेत्र से जुड़े हितधारकों ने भाग लेकर प्राकृतिक खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल कीं।

इस अवसर पर अतिरिक्त जिला कलक्टर बाली शैलेन्द्र सिंह, उपखंड अधिकारी कालूराम, तहसीलदार, विकास अधिकारी, जिला स्तरीय अधिकारी, जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।

दो दिवसीय किसान मेला और कार्यशाला को क्षेत्र में प्राकृतिक एवं जैविक खेती के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान रसायन आधारित खेती से धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते हैं तो इससे न केवल मिट्टी और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि किसानों की आय और आमजन के स्वास्थ्य को भी बड़ा लाभ मिलेगा।

Rajasthan Today

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