स्वधर्मी की मदद से बढ़ता है जीवन का पुण्य, नेत्रदान से अमर हो सकती है रोशनी : वरुण मुनि

पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान रविवार को धर्मसभा में संतों ने धर्म के साथ सेवा, स्वधर्मी सहयोग, सद्भाव और नेत्रदान का महत्व बताया। सभा में डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि संसार में धन खर्च करने से बहुत सी सुविधाएं हासिल की जा सकती हैं, लेकिन सही समय पर सही वाणी और मधुर बोलने की कला केवल संस्कारों और साधना से आती है। उन्होंने समाज में आपसी सहयोग और स्वधर्मी भाइयों की मदद को जीवन का महत्वपूर्ण दायित्व बताया।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि समाज की जाजम पर गरीब और अमीर सभी समान हैं। सेवा और सहयोग की शुरुआत बड़ी राशि से ही हो, यह जरूरी नहीं है। व्यक्ति एक रुपए से भी शुरुआत कर सकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार स्वधर्मी परिवारों की मदद का भाव रखे तो समाज में किसी जरूरतमंद को अकेला नहीं रहना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी बेटी के विवाह में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने के लिए तैयार रहता है। यदि उसी खर्च का छोटा सा हिस्सा जरूरतमंद स्वधर्मी परिवार की मदद में लगाया जाए तो यह समाज के लिए बड़ी सेवा होगी। सेवा और शुभभावना से मिला आशीर्वाद जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

डॉ. वरुण मुनि ने अपने प्रवचन के दौरान एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक ज्योतिषी ने एक व्यक्ति से कहा था कि उसके पुत्र की मृत्यु उसकी शादी के दिन हो जाएगी। समय बीतने के बाद पुत्र जवान हुआ और उसकी शादी की बात चली। परिवार ने एक गुणवान और चरित्रवान लड़की को पसंद किया और दोनों का विवाह हो गया।
मुनि ने बताया कि शादी की पहली रात नवविवाहिता ने अपने पति से कहा कि उसका तेल का व्रत है। इसी दौरान रात में घर के बाहर एक गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। घर के सभी लोग सो रहे थे। नवविवाहिता ने अपनी परवाह किए बिना सजी-धजी अवस्था में बाहर जाकर उस महिला की मदद की और उसकी डिलीवरी करवाई।
बच्चे के जन्म के बाद महिला की मां ने नवविवाहिता को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वह हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहे। इसके बाद वह वापस कमरे में आई तो देखा कि तेज हवा के कारण खिड़की के बीच एक सांप आ गया था और उसकी मृत्यु हो चुकी थी। नवविवाहिता ने सांप को वहां से हटाकर एक तरफ रख दिया।
सुबह जब नवविवाहित दंपती हंसते हुए बाहर आए तो परिवार के लोग और ज्योतिषी उन्हें देखकर हैरान रह गए। जब पूरी घटना सामने आई तो ज्योतिषी ने कहा कि जिस मौत के आने की भविष्यवाणी की गई थी, वह टल गई। मुनि ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि किसी जरूरतमंद की सेवा और उसके मन से निकला आशीर्वाद भी जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
धर्मसभा में आई बैंक सोसायटी के प्रतिनिधियों का भी स्वागत किया गया। डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि जो लोग दूसरों की आंखों में रोशनी लौटाने का काम करते हैं, वे वास्तव में अंधेरे जीवन को उजाले की ओर ले जाते हैं। नेत्रदान मानव सेवा का ऐसा कार्य है, जिसका लाभ किसी जरूरतमंद व्यक्ति को जीवनभर मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद शरीर समाप्त हो जाता है, लेकिन नेत्रदान के माध्यम से किसी जरूरतमंद की जिंदगी में रोशनी पहुंचाई जा सकती है। अपनी आंखों के माध्यम से किसी दूसरे व्यक्ति को दुनिया देखने का अवसर देना मानवता की बड़ी सेवा है।

इसके बाद गुरुदेव सुकन मुनि ने धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने पूज्य गुरुदेव रघुनाथ जी महाराज, मरुधर केसरी मिश्रीमल जी महाराज और रूप मुनि महाराज के चरणों में कोटि-कोटि वंदन करते हुए भगवान महावीर की वाणी को जीवन में आत्मसात करने का संदेश दिया।
सुकन मुनि ने कहा कि भगवान महावीर की वाणी ने अनगिनत प्राणियों के जीवन का उद्धार किया है। व्यक्ति जितना अधिक धर्म और सद्कर्म करेगा, उसका जीवन उतना ही महान बनेगा। उन्होंने कहा कि आज अष्टमी का दिन है और आने वाले दिनों में पर्युषण पर्व का शुभारंभ होने जा रहा है। ऐसे समय में भगवान महावीर की वाणी को केवल सुनने के बजाय उसे जीवन में उतारने का संकल्प लेना चाहिए।
सुकन मुनि ने कहा कि जीवन कल्याण का मार्ग वही व्यक्ति आगे बढ़ा सकता है, जिसके मन में प्रत्येक प्राणी के प्रति सौहार्द की भावना हो। जिनके जीवन में प्रेम, वात्सल्य और करुणा होती है, वे अपने जीवन को सही दिशा में आगे ले जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है। जब धर्म के गुण व्यक्ति के व्यवहार और जीवन में दिखाई देने लगें, तभी उसका वास्तविक लाभ मिलता है। व्यक्ति को संसार में रहते हुए मधुरता और सद्भाव का व्यवहार अपनाना चाहिए। बिना एक-दूसरे को जाने और पहचाने भी समाज में सुखी जीवन संभव नहीं है, इसके लिए आपसी प्रेम और विश्वास जरूरी है।
धर्मसभा के दौरान आई बैंक सोसायटी के केवलचंद कवाड़ ने उपस्थित श्रद्धालुओं को नेत्रदान से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने नेत्रदान की उपयोगिता और जरूरतमंदों के जीवन में इसके महत्व के बारे में बताया। इस अवसर पर नेत्रदान जागरूकता से संबंधित पोस्टर का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम के माध्यम से समाज के लोगों को मृत्यु के बाद नेत्रदान के लिए आगे आने और मानव सेवा के इस कार्य को जन-जन तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर संघ की ओर से आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। मंत्री प्रकाश कटारिया, अध्यक्ष पदमचंद लालवानी सहित संघ के सदस्यों ने विजेता बच्चों को पुरस्कार प्रदान किए।
पुरस्कार प्राप्त करने वाले बच्चों का उत्साह बढ़ाते हुए आयोजकों ने कहा कि धार्मिक आयोजनों के साथ बच्चों को रचनात्मक और ज्ञानवर्धक गतिविधियों से जोड़ना आवश्यक है। इससे उनमें संस्कार, अनुशासन, प्रतिभा और प्रतियोगिता की भावना विकसित होती है।
चातुर्मास कार्यक्रम की धर्मसभा में धर्मोपदेश के साथ सेवा, स्वधर्मी सहयोग, नेत्रदान और सद्भाव जैसे सामाजिक संदेशों ने श्रद्धालुओं को मानवता के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी।



