google.com, pub-3021598506696014, DIRECT, f08c47fec0942fa0
Paliदेशब्रेकिंग न्यूज़राजस्थानराज्य

पर्यूषण पर्व का छठा दिन ब्रह्मचर्य को समर्पित, संतों ने दिया संयम और गुरु भक्ति का संदेश

पाली : रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत पर्यूषण पर्व के छठे दिन को ब्रह्मचर्य दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर धर्मसभा में संतों ने श्रद्धालुओं को संयम, तप, त्याग, गुरु भक्ति, माता-पिता की सेवा और आत्मशुद्धि का संदेश दिया। सुबह से ही भवन में धर्म-ध्यान और तपस्या का वातावरण बना रहा।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि पर्यूषण पर्व का छठा दिन ब्रह्मचर्य को समर्पित है। ये दिन धर्म, ध्यान और तप के लिए विशेष अवसर हैं। मनुष्य को ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर अपने जीवन में संयम और त्याग को स्थान देना चाहिए।

सुकन मुनि ने ब्रह्मचर्य के महत्व को समझाते हुए कहा कि जब व्यक्ति सेवा, संयम और आत्मचिंतन में संलग्न रहता है तथा उसके भीतर ज्ञान की वृद्धि और वैराग्य का भाव आता है, तो जीवन अपने आप सही दिशा में आगे बढ़ता है।

उन्होंने सेठ सुदर्शन की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य का वास्तविक भाव जीवन में संयम और आत्मनियंत्रण के रूप में उतरना चाहिए। मनुष्य को अपने जीवन के कल्याण के लिए इन आठ दिनों के तप, संयम और त्याग का अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि महापुरुषों की वाणी को केवल सुनने तक सीमित न रखकर उसे जीवन में उतार लिया जाए तो मानव जीवन धन्य हो सकता है।

इससे पूर्व उपप्रवर्तक अमृत मुनि ने गुरु भक्ति और आज्ञापालन का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने गुरु के आदेश और मार्गदर्शन के अनुसार जीवन जीता है, उसका जीवन महान बन सकता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से पर्यूषण पर्व के बचे हुए दिनों में धर्म, ध्यान, तप और दान का अधिक से अधिक लाभ लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पाली में गुरु भक्ति की परंपरा हमेशा मजबूत रही है और श्रद्धालुओं को इन पवित्र दिनों का पूरा लाभ उठाना चाहिए। धर्मसभा में साध्वी संयम ज्योति ने ‘जननी और जन्मभूमि’ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है।

उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति सुख की तलाश में एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक जाता है, लेकिन भगवान ने माता-पिता की सेवा को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। यदि व्यक्ति घर में रहकर अपने माता-पिता की सेवा कर ले तो उसके लिए यही सेवा अनेक तीर्थों के समान पुण्यदायी हो सकती है।

उन्होंने कहा कि जीवन में यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि माता-पिता बोझ नहीं हैं, बल्कि उनकी सेवा करना हमारा कर्तव्य है। माता-पिता के प्रति सम्मान और सेवा का भाव जीवन को संस्कारवान बनाता है।

साध्वी ने भगवान महावीर के संदर्भ में मां त्रिशला की महिमा का उल्लेख करते हुए श्रद्धालुओं को मातृ सम्मान और गुरु भक्ति का संदेश दिया।

साध्वी संयम ज्योति ने गुरु के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। गुरु ही व्यक्ति को सही मार्ग दिखाते हैं और जीवन को धर्म एवं आत्मकल्याण की दिशा प्रदान करते हैं।

इस दौरान महेश मुनि ने गुरु की महिमा पर आधारित भक्ति गीत की प्रस्तुति दी। गीत के माध्यम से गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव प्रकट किया गया।

सुबह के सत्र में डॉ. वरुण मुनि ने कल्पसूत्र वाचन किया। उन्होंने विभिन्न धार्मिक कथाओं का विस्तार से वर्णन करते हुए सुदर्शन मुनि और अर्जुन माली की कथा सुनाई।

उन्होंने बताया कि किस प्रकार अर्जुन माली एक हत्यारे के रूप में जीवन जी रहा था, लेकिन परिस्थितियां बदलीं और धर्म एवं साधना के मार्ग पर चलकर उसका जीवन पूरी तरह परिवर्तित हो गया। कथा के माध्यम से उन्होंने बताया कि मनुष्य के जीवन में परिवर्तन का अवसर कभी भी आ सकता है और सही मार्गदर्शन मिलने पर व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है।

डॉ. वरुण मुनि ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन करते हुए धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण अवसरों को पहचानना जरूरी है और धर्म, दर्शन तथा साधना के लिए समय निकालना चाहिए।

ब्रह्मचर्य दिवस के अवसर पर डॉ. वरुण मुनि ने विजय सेठ और विजया सेठानी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि दोनों ने अपने गुरु से पच्चखाण लेकर पूरी जिंदगी ब्रह्मचर्य का पालन किया।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल बाहरी आचरण नहीं बल्कि मन, विचार और दृष्टि की शुद्धता से भी जुड़ा है। व्यक्ति के मन में विकार उत्पन्न न हो और वह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखे, यही ब्रह्मचर्य की साधना है।

उन्होंने वर्तमान समय का उदाहरण देते हुए महाराष्ट्र के एक दंपती का भी उल्लेख किया, जिन्होंने गुरु से पच्चखाण लेकर लंबे समय से ब्रह्मचर्य का पालन किया और पति-पत्नी होते हुए भी भाई-बहन की तरह जीवन जी रहे हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि कम से कम ब्रह्मचर्य दिवस पर सभी संयम, ज्ञान और तप का संकल्प लें।

ब्रह्मचर्य दिवस के अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं केसरिया साड़ी पहनकर कार्यक्रम में पहुंचीं। धार्मिक वातावरण में महिलाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान अगले दिन पीली साड़ी में आने का भी आह्वान किया गया।

धर्मसभा एवं कार्यक्रम के पश्चात तपस्या करने वाले श्रावकों को संतों की ओर से पच्चखाण दिलाया गया। पीपाड़ से आए श्रावक गौतमचंद मुथा के 30 उपवास तथा बाली से आई महेंद्र सोनी की पत्नी के 9 उपवास की तपस्या के लिए पच्चखाण दिया गया।

पर्यूषण पर्व के छठे दिन आयोजित धर्मसभा में तप, संयम, ब्रह्मचर्य, गुरु भक्ति, माता-पिता की सेवा और आत्मशुद्धि का संदेश प्रमुख रहा। संतों ने श्रद्धालुओं से इन धार्मिक दिनों का अधिक से अधिक लाभ उठाते हुए अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया।

Rajasthan Today

Related Articles

Back to top button