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संवत्सरी के बाद पाली में तपस्वियों का हुआ अनुमोदन, डॉ. वरुण मुनि ने गुरु भक्ति और समर्पण का सुनाया प्रसंग

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत गुरुवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। संवत्सरी पर्व के बाद विभिन्न स्थानों से आए गुरु भक्तों एवं तपस्वियों का अनुमोदन किया गया। इस अवसर पर डॉ. वरुण मुनि ने गुरु की महिमा, गुरु के प्रति समर्पण और सरल भाव से किए गए धर्मकार्य के महत्व पर प्रकाश डाला।

धर्मसभा में तपस्या करने वाले श्रावक-श्राविकाओं के साथ छोटे बच्चों का भी अनुमोदन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु मौजूद रहे।

प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने गुरु की महिमा बताते हुए कहा कि गुरु का प्रभाव और उनकी कृपा ऐसी होती है, जिसका अनुभव व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं करता है। उन्होंने गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण को जीवन में महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि गुरु की कृपा से व्यक्ति का जीवन धन्य हो सकता है।

उन्होंने कहा कि केवल खान-पान और भौतिक चीजों पर अधिक ध्यान देने के बजाय व्यक्ति को अपने जीवन में धर्म, संयम और गुरु सेवा को महत्व देना चाहिए। संवत्सरी जैसे पर्व आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना का अवसर प्रदान करते हैं।

डॉ. वरुण मुनि ने प्रवचन के दौरान गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ी एक प्रेरक कथा भी सुनाई। उन्होंने बताया कि एक गुरु के कई शिष्य थे। इनमें एक शिष्य ऐसा था, जिसका ध्यान पढ़ाई से अधिक खाने-पीने पर रहता था। इसी कारण उसकी पढ़ाई में प्रगति नहीं हो रही थी और वह अन्य शिष्यों की तुलना में सरल स्वभाव का था।

गुरु के बताए कार्यों को पूरा करने में भी वह पीछे रहता था। लेकिन गुरु के प्रति उसके मन में श्रद्धा और समर्पण था। प्रवचन में गौतम स्वामी के सरल स्वभाव और गुरु के प्रति समर्पण का भी उदाहरण दिया गया।

कथा के अनुसार जब गुरु का अंतिम समय निकट आया तो वे एक ग्रंथ लिख रहे थे। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि वे इस ग्रंथ को पूरा करें। गुरु ने योग्य और होशियार शिष्यों को भी इसे पूरा करने का प्रयास करने को कहा, लेकिन साथ ही कहा कि अंततः यह ग्रंथ पूर्ण पूरी ही पूरा करेगा।

एक-एक कर कई शिष्यों ने ग्रंथ पूरा करने का प्रयास किया, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी कार्य पूरा नहीं हो सका। इसके बाद पूर्ण पूरी ने गुरु के सामने प्रार्थना की। गुरु की कृपा और आशीर्वाद से उसमें ज्ञान का संचार हुआ और उसने थोड़े ही समय में ग्रंथ को पूरा कर दिया। डॉ. वरुण मुनि ने इस प्रसंग के माध्यम से गुरु के प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण का महत्व बताया।

चातुर्मास के दौरान जैन समाज में तपस्या का दौर जारी है। कार्यक्रम में बताया गया कि 100 से अधिक श्रद्धालुओं ने अठाई तपस्या की है। इनमें कई छोटे बच्चों ने भी पहली बार आठ उपवास की तपस्या की।

इसके अलावा अनेक श्रद्धालुओं ने तीन, पांच और 11 उपवास सहित विभिन्न प्रकार की तपस्याएं कीं। संवत्सरी पर्व के बाद इन तपस्वियों का पचक्खाण एवं अनुमोदन किया गया।

गुरुदेव सुकन मुनि ने भी तपस्वियों की तपस्या की अनुमोदना करते हुए कहा कि चातुर्मास के दौरान बड़ी संख्या में तपस्वी पधारे हैं और समाज के लोगों ने तपस्या के प्रति श्रद्धा दिखाई है। उन्होंने मासक्षमण और अठाई जैसी तपस्याएं करने वाले सभी तपस्वियों का स्वागत एवं अनुमोदन किया।

इस अवसर पर महेंद्र भंसाली की 11 तपस्या सहित अन्य तपस्वियों की तपस्या का भी अनुमोदन किया गया। हेमा सुराणा, प्रकाश सिंह एवं ओमप्रकाश कोठारी सहित अन्य तपस्वियों की तपस्या के पचक्खाण आगामी दिनों में किए जाने की जानकारी दी गई।

चातुर्मास के दौरान छोटे बच्चों द्वारा की गई तपस्या ने भी समाज का ध्यान आकर्षित किया। पहली बार अठाई तप करने वाले बच्चों के साथ तीन, पांच और 11 उपवास करने वाले श्रावक-श्राविकाओं का भी धर्मसभा में अनुमोदन किया गया। धर्मसभा में वक्ताओं ने तपस्या को आत्मसंयम, अनुशासन और आध्यात्मिक साधना का माध्यम बताते हुए तपस्वियों की भावना की सराहना की।

कार्यक्रम में बाहर से पधारे गुरु भक्तों एवं समाज के लोगों का स्वागत किया गया। अरुण कुमार भंसाली, अमरचंद स्वर्णकार सहित सहयोग करने वाले श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया गया। पुष्पा जी, गौतम चंद बेंगलुरु एवं सरवाड़ से पधारे श्रद्धालुओं का भी स्वागत किया गया। रानी गांव से आए शांतिलाल जी सहित सभी तपस्वियों एवं गुरु भक्तों का अनुमोदन किया गया।

श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान नियमित रूप से धार्मिक आयोजन और प्रवचन हो रहे हैं। संवत्सरी पर्व के बाद आयोजित इस कार्यक्रम में गुरु भक्ति, शिष्य के समर्पण और तपस्या की महत्ता पर विशेष जोर रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और बच्चों द्वारा की गई तपस्या के अनुमोदन से धर्मसभा का वातावरण श्रद्धा और भक्ति से भर गया।

Rajasthan Today

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