
पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत सोमवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। इस दौरान डॉ. वरुण मुनि ने अपने प्रवचन में जीवन में सत्य, प्रेम, त्याग और आत्मचिंतन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य सत्य वाणी बोलने और सत्य के लिए जीवन जीने के गुण को अपने जीवन में उतार ले तो उसका जीवन सार्थक हो सकता है।
डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र और रानी तारा की कथा के माध्यम से मोह के बंधन तथा सच्चे प्रेम के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जब किसी वस्तु, व्यक्ति या आदत के मोह में बंध जाता है तो वह उसका गुलाम बन जाता है। वहीं प्रेम में त्याग और दूसरे के कल्याण की भावना होती है।
कथा प्रसंग में उन्होंने बताया कि राजा हरिश्चंद्र महल पहुंचे तो उन्होंने रानी तारा की स्थिति देखकर पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए और तुम्हें किस चीज की कमी है। रानी तारा ने राजा से सोने की मूंछ वाला हिरण लाने की इच्छा व्यक्त की। राजा ने तुरंत उसे लाने की बात स्वीकार कर ली। रानी ने कहा कि यदि आप स्वयं जाकर हिरण लेकर नहीं आएंगे तो महल में वापस मत आना।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि रानी तारा ने राजा को मोह से दूर करने के उद्देश्य से उन्हें जंगल की ओर भेजा। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को किसी वस्तु या आदत की लत लग जाए तो उससे दूरी बनाना जरूरी होता है। उन्होंने बच्चों के मोबाइल देखने का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि बच्चे लगातार मोबाइल देखते हैं तो मोबाइल को उनसे दूर रखने से उनकी आदत में सुधार आ सकता है।

प्रवचन में बताया गया कि राजा हरिश्चंद्र सुबह से शाम तक जंगल में सोने की मूंछ वाले हिरण की तलाश करते रहे, लेकिन उन्हें ऐसा हिरण नहीं मिला। इसी दौरान एक हिरण उनके पास आया। राजा ने हिरण को देखकर उसकी आंखों में अपनी पत्नी जैसी शांति महसूस की और कहा कि तुम्हारी आंखों में वही शांति है, जो कभी मेरी पत्नी में हुआ करती थी।
डॉ. वरुण मुनि ने इस प्रसंग के माध्यम से कहा कि मनुष्य को जीवन में किसी पर अनावश्यक क्रोध नहीं करना चाहिए। कोई व्यक्ति आपका अपमान करे, तब भी धैर्य बनाए रखना चाहिए। राजा को हिरण की तलाश करते हुए एक-एक दिन करके पूरा सप्ताह बीत गया, लेकिन उन्हें हिरण नहीं मिला। हालांकि इस दौरान उन्हें प्रकृति के सान्निध्य और शांति का अनुभव हुआ।
कथा में आगे बताया गया कि जब राजा को लगा कि रानी का वचन पूरा नहीं हुआ और अब उन्हें महल लौटना चाहिए, उसी समय रानी तारा ने भी सोचा कि उनका पति जंगल में भटक रहा है और वह महल में रह रही हैं। इसके बाद रानी ने भी महल का त्याग कर बगीचे में रहने का निर्णय लिया और अन्न का त्याग कर दिया।
जब राजा वापस लौटे तो उन्होंने रानी के बारे में पूछा। दासी ने बताया कि रानी बगीचे में हैं और उन्होंने अन्न का भी त्याग कर दिया है। राजा ने रानी से पूछा कि आप कैसी हैं। इस पर रानी ने उनसे पूछा कि क्या आपने अपना प्रण पूरा किया?
रानी की बात सुनकर राजा ने कहा कि जिस प्रकार के हिरण की मांग आपने की थी, वैसा हिरण दुनिया में मिलना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जंगल में जाकर उन्हें प्रकृति और शांति का अनुभव हुआ तथा उन्हें समझ आया कि जीवन में मोह और वास्तविक प्रेम के बीच कितना अंतर है।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि मोह के बंधन में व्यक्ति गुलाम बन जाता है, जबकि सच्चे प्रेम में व्यक्ति त्याग करना सीखता है। उन्होंने परिवार में आपसी समझ और प्रेम बनाए रखने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि परिवार में पति-पत्नी के बीच आपसी सम्मान और समझ जरूरी है। यदि घर में एक-दूसरे की बात को समझने के बजाय विवाद बढ़ाया जाए तो अशांति का वातावरण बन जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन में शांति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्रकृति से जुड़ना चाहिए और अपनी अनावश्यक इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।
इससे पूर्व साध्वी प्रीति सुधा ने अपने प्रवचन में जीवन जीने की कला पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन सुख में जीना है या दुख में, यह काफी हद तक हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार पर निर्भर करता है। घर में दस सदस्य हों तो उनके साथ किस प्रकार जीवन जीना है, यह व्यक्ति की समझ पर निर्भर करता है।
उन्होंने जीवन जीने के तीन शब्द—साधना, वेदना और वंदना—बताते हुए कहा कि साधना का उद्देश्य आत्मा को उसके लक्ष्य तक पहुंचाना है। साधना का मार्ग आसान नहीं होता। जो व्यक्ति कठिनाइयों और पीड़ा को सहन करते हुए साधना करता है, उसकी वंदना की जाती है।
उन्होंने कहा कि आत्मिक उन्नति के लिए साधना आवश्यक है और साधना के मार्ग पर आने वाली वेदना को सहन करने की क्षमता भी मनुष्य में होनी चाहिए।
धर्मसभा के दौरान अमृतवाणी के माध्यम से तपस्या करने वाले श्रद्धालुओं को पचकान दिलाया गया। इस अवसर पर बाहर से आए श्रद्धालुओं और संघ से जुड़े लोगों का स्वागत भी किया गया।
मंत्री प्रकाश कटारिया ने बाबूलाल बोरा, सोजत सिटी से आए अनिल जी एवं महेंद्र जैन से स्वागत करवाया। वहीं दिलीप कटारिया, बिहार से आए चेन्नई के ज्ञानचंद, विनोद जी सोजत सिटी, रामेश्वर जी, उत्तमचंद जी अजमेर, राजेंद्र चोपड़ा सहित अन्य श्रद्धालुओं का संघ की ओर से महेंद्र जैन एवं धनराज जी ने स्वागत किया।
चातुर्मास कार्यक्रम के तहत आगामी बुधवार को आचार्य आत्माराम जी महाराज की 144वीं जयंती मनाई जाएगी। इस अवसर पर दो सामायिक रखे जाएंगे। जयंती कार्यक्रम को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है तथा धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।



