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पाली में चातुर्मास प्रवचन, साध्वी प्रीति सुधा ने कहा- परमात्मा को जानना है तो पहले स्वयं की आत्मा को पहचानें

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत रविवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। प्रवचन के दौरान साध्वी प्रीति सुधा ने आत्मा, परमात्मा, धर्म, प्रेम और जीवन में संयम के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आत्मा के स्वरूप को समझना ही परमात्मा की ओर बढ़ने का मार्ग है। व्यक्ति को परमात्मा को जानने से पहले स्वयं की आत्मा को जानने और पहचानने का प्रयास करना चाहिए।

साध्वी प्रीति सुधा ने कहा कि आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझना आवश्यक है। उन्होंने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन में आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरूकता का महत्व समझाया।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने जीवन में बाहरी सुख-सुविधाओं के पीछे भागता रहता है, लेकिन वास्तविक शांति और संतोष आत्मिक जागरूकता से प्राप्त होता है। धर्म के मार्ग से जुड़ने पर व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है।

प्रवचन के दौरान साध्वी ने राजा चंद्रसेन की कथा सुनाई। कथा के अनुसार राजा अपना राज्य छोड़ने की तैयारी कर रहे थे। उनके जाने की बात सुनकर उनकी बारह रानियां रोने-बिलखने लगीं। राजा ने संकल्प लिया कि जब तक उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं होगी, तब तक वे चंपापुरी वापस नहीं लौटेंगे।

राजा पूर्व दिशा की ओर निकल पड़े और एक वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। सुबह करीब चार बजे उन्हें स्वप्न में कुलदेवी के दर्शन हुए। कथा के अनुसार कुलदेवी ने उन्हें पूर्व दिशा में करीब डेढ़ सौ मीटर आगे जाने को कहा, जहां उन्हें एक सांप मिलेगा। इस प्रसंग के माध्यम से साध्वी ने जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने और आत्मविश्वास बनाए रखने का संदेश दिया।

साध्वी प्रीति सुधा ने वर्तमान जीवनशैली पर भी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज लोगों के पास सुविधाएं और साधन बढ़ गए हैं, लेकिन पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों में बदलाव देखने को मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि पहले घर कच्चे होते थे, लेकिन दिल पक्के होते थे। आज मकान पक्के हो गए हैं, लेकिन कई बार दिलों में अपनापन कम होता जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले घर में आने वाले मेहमानों का आत्मीयता से स्वागत किया जाता था, जबकि आज कई लोग मेहमानों को होटल या समाज भवन में ठहराना पसंद करते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को परिवार और समाज में आत्मीयता, सेवा और अपनत्व की भावना बनाए रखने का संदेश दिया।

साध्वी ने राजा भरत चक्रवर्ती से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए एकाग्रता का महत्व समझाया। कथा के अनुसार राजा भरत ने एक व्यक्ति को तेल से भरा कटोरा देकर पूरे नगर में घूमने के लिए कहा और चेतावनी दी कि तेल की एक बूंद भी नहीं गिरनी चाहिए।

जब वह व्यक्ति वापस लौटा तो राजा ने उससे पूछा कि उसने नगर में क्या-क्या देखा। व्यक्ति ने बताया कि उसका पूरा ध्यान तेल से भरे कटोरे पर था, इसलिए उसने आसपास की किसी चीज पर ध्यान नहीं दिया।

साध्वी ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि जिस प्रकार व्यक्ति का पूरा ध्यान कटोरे पर था, उसी प्रकार मनुष्य को अपनी आत्मा और ईश्वर की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

इसके बाद डॉ. वरुण मुनि ने अपने प्रवचन में परमात्मा के प्रति प्रेम और समर्पण के मार्ग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सच्चे प्रेम में समर्पण, संवेदना और त्याग की भावना होती है। प्रेम केवल सुख के समय साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाने का भाव है।

उन्होंने भगवान महावीर के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से बताया कि व्यक्ति को आपसी बैर और द्वेष की भावना को छोड़कर प्रेम एवं करुणा का मार्ग अपनाना चाहिए।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के प्रति मन में बैर या विरोध की भावना है तो उसे भी प्रेम और सद्भाव की दृष्टि से देखने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने भगवान महावीर के जीवन और उनके संदेशों का उल्लेख करते हुए अहिंसा, करुणा और मैत्री की भावना को जीवन में अपनाने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि प्रेम व्यक्ति को भीतर से बदलने की क्षमता रखता है और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मन में द्वेष के स्थान पर करुणा का होना आवश्यक है।

चातुर्मास के दौरान चल रही राजा हरिश्चंद्र की कथा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र और रानी तारा के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जीवन के सुख-दुख में पति-पत्नी का एक-दूसरे के साथ खड़ा रहना महत्वपूर्ण है।

कथा के अगले प्रसंग में रानी तारा अपने मन की व्यथा के कारण कोप भवन में जाकर बैठ जाती हैं। जब राजा हरिश्चंद्र को इसकी जानकारी होती है तो वे दौड़ते हुए रानी के पास पहुंचते हैं और उनसे कारण पूछते हैं। कथा का यह प्रसंग श्रद्धालुओं के बीच उत्सुकता का विषय रहा। इसके आगे की कथा का वाचन आगामी प्रवचन में किया जाएगा।

कार्यक्रम के दौरान तपस्या करने वाले श्रावक-श्राविकाओं का संघ की ओर से बहुमान किया गया। मंत्री प्रकाश कटारिया ने राणावास से आईं 35 उपवास की तपस्या करने वाली विमला देवी, भीलवाड़ा से आए 8 उपवास करने वाले दर्शन कुमार तथा 15 उपवास की तपस्या करने वाली छवि मेहता का बहुमान करवाया।

इसके बाद गुरुदेव ने तपस्वियों को पचकान प्रदान किया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने तपस्वियों के तप की अनुमोदना की और उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया।

कार्यक्रम के दौरान गुरुदेव सुकनमुनि ने मंगलाचरण सुनाया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे और उन्होंने संतों के प्रवचनों का श्रवण किया।

चातुर्मास कार्यक्रम के तहत कथा और प्रवचन का क्रम आगे भी जारी रहेगा, जिसमें आत्मा, धर्म, संयम, प्रेम, त्याग और जीवन मूल्यों से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिए जाएंगे।

Rajasthan Today

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