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भाग्य के साथ कर्म और पुरुषार्थ जरूरी, विपरीत परिस्थितियों में हार नहीं मानें : डॉ. वरुणमुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत बुधवार को धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए डॉ. वरुणमुनि ने भाग्य, कर्म, पुरुषार्थ और जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को लेकर प्रेरक प्रसंग सुनाए। उन्होंने कहा कि संसार में लाभ-हानि और सुख-दुख के पीछे भाग्य की भूमिका होती है, लेकिन मनुष्य को परिस्थितियों से घबराकर हार नहीं माननी चाहिए। कठिन समय में धैर्य, साहस और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ना ही जीवन की वास्तविक परीक्षा है।

डॉ. वरुणमुनि ने रामायण के राम-भरत प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब अयोध्या के राजा राम को वनवास मिला तो इसका सबसे अधिक दुख भरत को हुआ। भरत को इस बात का दुख था कि उनकी माता के कारण उन पर भी आरोप और बदनामी का प्रभाव पड़ा। वे अत्यंत दुखी होकर गुरु वशिष्ठ के पास पहुंचे और अपना मन हल्का किया। इस पर गुरु वशिष्ठ ने समझाया कि इस घटना के लिए किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह सब भाग्य में लिखा था।

उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कब बदल जाएं, इसका कोई भरोसा नहीं। जिस प्रकार चंद्रमा को भी राहु के कारण ग्रहण लगता है, उसी प्रकार जीवन में सुख के बीच अचानक कठिनाइयां आ सकती हैं। एक रात में परिस्थितियां बदल सकती हैं। अमीर व्यक्ति गरीब और गरीब व्यक्ति अमीर हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शेयर बाजार में भी परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव से लोगों की आर्थिक स्थिति बदलती रहती है।

डॉ. वरुणमुनि ने कहा कि मनुष्य अपने कर्मों से बच नहीं सकता। कर्मों का फल व्यक्ति को जीवन में किसी न किसी रूप में मिलता है। कर्मों की मार पड़ने पर मनुष्य को अपनी गलतियों का अहसास होता है और वह सही दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करता है।

उन्होंने राजा हरिश्चंद्र का उदाहरण देते हुए कहा कि राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म के मार्ग को नहीं छोड़ा। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें राजपाट छोड़कर कठिन जीवन जीना पड़ा, लेकिन उन्होंने सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ा। उनके जीवन का संदेश यही है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, व्यक्ति को अपने सिद्धांतों से विचलित नहीं होना चाहिए।

प्रवचन के दौरान राजा हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए डॉ. वरुणमुनि ने कहा कि जब राजा हरिश्चंद्र ने अपना राज्य छोड़ने का निर्णय लिया तो वे विश्वामित्र के दरबार में पहुंचे और कहा कि आज से यह राज्य आपका है। मेरी प्रजा को किसी प्रकार का दुख नहीं होना चाहिए, यही मेरी इच्छा है।

राजा जब अपनी पत्नी और पुत्र के साथ राज्य से बाहर निकलने लगे तो हजारों लोग उनके साथ चल पड़े। प्रजा का अपने राजा के प्रति यह प्रेम देखकर माहौल भावुक हो गया। लोगों ने राजा से कहा कि हमें भी अपने साथ ले चलिए। इस पर राजा हरिश्चंद्र ने प्रजा को समझाते हुए कहा कि आप मेरे प्रति प्रेम और धर्म भावना के कारण यहां आए हैं, लेकिन यदि आप मेरे साथ चले गए तो आपका भी कर्तव्य प्रभावित होगा। उन्होंने सभी को वापस लौटने के लिए समझाया।

वहीं रानी ने भी पति का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया। रानी ने कहा कि पति की सेवा करना उनका धर्म है और पति के दुख व कष्ट में उनका भी समान भाग है। इसके बाद प्रजा भावुक मन से वापस लौट गई।

डॉ. वरुणमुनि ने कहा कि दुख को सुख में बदलने की क्षमता मनुष्य के भीतर होनी चाहिए। जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में घबरा जाता है, वह अपनी लड़ाई हार जाता है। उन्होंने कहा कि डरकर पीछे हटना वीरता नहीं है। जीवन में कितनी भी परेशानी आए, व्यक्ति को यह संकल्प रखना चाहिए कि वह हार नहीं मानेगा और परिस्थितियों का सामना करेगा।

उन्होंने गृहस्थ जीवन के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति धर्म, सेवा और सदाचार के माध्यम से अपना जीवन सार्थक बना सकता है। भगवान महावीर ने मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलने तथा आत्मसंयम और पुरुषार्थ के माध्यम से जीवन को ऊंचा उठाने का मार्ग बताया है।

धर्मसभा में साध्वी प्रीति सुधा ने कहा कि यदि मनुष्य आत्मा को परमात्मा के स्वरूप तक ले जाना चाहता है तो उसे प्रभु भक्ति में लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में संयम का रंग अपने आप नहीं चढ़ता, इसके लिए सही मार्गदर्शन और प्रेरणा देने वाला आवश्यक होता है।

उन्होंने भगवान महावीर के समय के नंदीसेन के प्रसंग के माध्यम से वैराग्य और साधना का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि भगवान की वाणी सुनने के बाद नंदीसेन के हृदय में वैराग्य का भाव उत्पन्न हुआ और उन्होंने प्रभु से दीक्षा देने का आग्रह किया। अनुमति नहीं मिलने के बाद भी उन्होंने दूसरे गुरु के पास जाकर दीक्षा ली और वर्षों तक कठोर तपस्या की। साध्वी ने कहा कि सच्चा धर्म व्यक्ति के भीतर परिवर्तन लाता है और उसे संयम, त्याग तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।

इस अवसर पर गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि श्रद्धालु चातुर्मास के दौरान महापुरुषों का इतिहास और उनके जीवन के प्रसंग सुन रहे हैं। ऐसे महापुरुष अपने कर्मों, त्याग, तपस्या और आदर्श जीवन के कारण समाज में अमर हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक होता है जब उसमें निराशा और विषाद के स्थान पर धर्म, संयम, त्याग और सकारात्मक सोच बनी रहे। महापुरुषों का जीवन वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उनके आदर्शों को अपनाकर जीवन को बेहतर दिशा दी जा सकती है।

धर्मसभा के दौरान उदयपुर से आए श्रावक कांतिलाल मेड़ता एवं दक्षिण भारत से आए जसवंत राज कोठारी का गुरुदेव ने अभिवादन किया। कार्यक्रम में मंत्री प्रकाश कटारिया ने गुरु भक्तों का स्वागत किया।

संघ की ओर से अध्यक्ष पदमचंद ललवानी सहित संघ के सदस्यों ने संतों एवं धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं का स्वागत किया। चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मसभा में मौजूद रहे और संतों के प्रवचनों का लाभ लिया।

Rajasthan Today

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