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जीवन के उतार-चढ़ाव को सीढ़ी बनाएं, गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति का जीवन बदल सकता है : सुकन मुनि

पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत गुरुवार को श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ परिसर में धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुदेव सुकन मुनि ने जीवन में आने वाले सुख-दुख, लाभ-हानि और उतार-चढ़ाव का सामना धैर्य के साथ करने का संदेश दिया। वहीं साध्वी प्रीति सुधा और डॉ. वरुणमुनि ने महापुरुषों के जीवन प्रसंगों के माध्यम से धर्म, पारिवारिक संस्कार, त्याग, संघर्ष और कर्तव्य की महत्ता समझाई।

गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि जीवन में उतार-चढ़ाव, सुख-दुख और लाभ-हानि आते रहते हैं। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूत बना रहता है, वह इन्हीं परिस्थितियों को अपने जीवन की सीढ़ी बना लेता है।

उन्होंने गुरु की महत्ता बताते हुए कहा कि गुरु का आशीर्वाद और मार्गदर्शन व्यक्ति के जीवन को नई दिशा दे सकता है। जिस व्यक्ति पर बड़ों और गुरुजनों की कृपा होती है, उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। उन्होंने कहा कि जीवन में बड़ों का आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिलने से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता हासिल करता है।

साध्वी प्रीति सुधा ने कहा कि भारत की धरती पर राम, कृष्ण, संत तुलसीदास और कबीर जैसे अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया और अपने जीवन तथा विचारों से समाज को दिशा दी। उन्होंने कहा कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, लेकिन व्यक्ति अपने कर्मों और आदर्शों से समाज में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों की वाणी सुनने से मनुष्य को सद्मार्ग की प्रेरणा मिलती है और जीवन में धर्म एवं संस्कारों को मजबूत आधार मिलता है।

साध्वी प्रीति सुधा ने सम्राट अशोक और उनके पुत्र कुणाल का प्रसंग सुनाते हुए पिता-पुत्र के संबंध और आज्ञापालन का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सम्राट अशोक के परिवार में आई नई रानी कुणाल को देखकर आकर्षित हुई और उसके सामने अपनी इच्छा प्रकट की। कुणाल ने इसे अनुचित समझते हुए वहां से दूर चले जाने का निर्णय लिया और तक्षशिला पहुंच गए।

प्रसंग के अनुसार, बाद में रानी ने राजा के नाम से ऐसा पत्र तैयार करवा दिया, जिसमें कुणाल की आंखें फोड़ने का आदेश लिखा था। जब यह पत्र कुणाल तक पहुंचा तो उन्होंने उसे पिता की आज्ञा मानते हुए स्वीकार कर लिया। साध्वी ने इस प्रसंग के माध्यम से परिवार में संस्कार, कर्तव्य और बड़ों के प्रति सम्मान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद एवं संस्कारों को मजबूत करने की आवश्यकता है।

साध्वी प्रीति सुधा ने साधु जीवन से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि साधु के जीवन में त्याग, संयम और मर्यादा का विशेष महत्व है। उन्होंने गुरु-शिष्य संबंध से जुड़े एक प्रसंग के माध्यम से बताया कि साधु जीवन में निर्णय भी धर्म और आत्मसंयम की भावना से जुड़े होते हैं।

धर्मसभा में डॉ. वरुणमुनि ने राजा हरिश्चंद्र के जीवन का प्रसंग सुनाते हुए कठिन परिस्थितियों में धैर्य और परिवार के सहयोग का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि वन में भटकते हुए राजा हरिश्चंद्र, रानी तारा और उनके पुत्र रोहित को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक समय भोजन और पानी की कमी के कारण राजा अत्यंत व्याकुल हो गए और बेहोश हो गए।

रानी तारा ने हिम्मत नहीं छोड़ी। वह पेड़ पर चढ़ी और दूर जलाशय दिखाई देने पर वहां से पानी लेकर आई। पानी के छींटे देने पर राजा को होश आया। राजा ने रानी के साहस और सूझबूझ की सराहना की तथा परिवार के साथ होने को अपना सौभाग्य माना।

इसके बाद परिवार काशी की ओर रवाना हुआ। रास्ते में गंगा नदी के दर्शन कर उन्होंने प्रणाम किया और एक धर्मशाला में ठहरे। डॉ. वरुणमुनि ने कहा कि पुराने समय में धर्मशालाएं यात्रियों को धर्म और विश्राम दोनों की सुविधा देती थीं। उन्होंने बदलते समय के साथ धर्मशालाओं की भूमिका में आए बदलाव का भी उल्लेख किया।

प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए डॉ. वरुणमुनि ने बताया कि राजा हरिश्चंद्र ने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय मेहनत करके जीवन चलाने का निर्णय लिया। उन्होंने काम मांगते हुए कहा कि वे भिखारी नहीं हैं और मजदूरी करके कमाना चाहते हैं।

इसी प्रकार रानी तारा ने भी परिवार का सहयोग करने के लिए काम करने का निर्णय लिया। उन्होंने बस्ती में जाकर महिलाओं से काम मांगा और मेहनत से कमाई कर भोजन तैयार किया। रानी ने पहले अपने पुत्र रोहित को भोजन कराया और पति के आने की प्रतीक्षा करती रही।

राजा जब वापस लौटे तो उन्होंने रानी को मेहनत करते देखा। इस पर उन्हें गर्व हुआ कि कठिन परिस्थितियों में भी उनकी पत्नी परिवार का साथ निभा रही है। डॉ. वरुणमुनि ने कहा कि परिवार की असली ताकत विपरीत परिस्थितियों में एक-दूसरे का सहयोग करने से सामने आती है।

प्रवचन के दौरान डॉ. वरुणमुनि ने पिता-पुत्र के रिश्ते पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि व्यापार या जीवन में कभी घाटा हो जाए तो पिता को केवल डांटने के बजाय पुत्र का हौसला बढ़ाना चाहिए। पुत्र को भी यह भावना रखनी चाहिए कि उसका पिता उसके साथ है और दोनों मिलकर मेहनत से नुकसान की भरपाई कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि परिवार में विश्वास, सहयोग और हौसला बढ़ाने की भावना हो तो बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति का सामना किया जा सकता है।

चातुर्मास धर्मसभा में गुरुदेव के कई श्रावक चेन्नई, बेंगलुरु, सोजत सहित विभिन्न स्थानों से पहुंचे। इस दौरान चेन्नई से आए श्रावक महावीर चंद्र सिसोदिया ने मरुधर केसरी गौशाला के लिए दो करोड़ रुपए का दान देने की घोषणा/दान किया। उन्होंने गुरुदेव की वंदना करते हुए पाली पहुंचकर संतों के दर्शन को अपना पुण्य बताया।

कार्यक्रम में मंत्री प्रकाश कटारिया ने बाहर से आए सभी श्रद्धालुओं का अभिवादन किया। संघ के अध्यक्ष पदमचंद ललवानी तथा संघ के सदस्यों केवलचंद जी, धनराज जी काठेड़ और पुखराज जी लासोड़ ने महावीर चंद्र सिसोदिया, सुभाष जी मुथा, ईश्वरलाल, गोपीचंद लोढ़ा, ललित कुमार सहित अन्य श्रद्धालुओं का बहुमान किया।

वहीं बेंगलुरु से पहुंची महिलाओं का पाली संघ की महिलाओं की ओर से स्वागत किया गया। चातुर्मास कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मसभा में भाग लेकर संतों के प्रवचन सुने।

Rajasthan Today

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