google.com, pub-3021598506696014, DIRECT, f08c47fec0942fa0
Paliदेशधार्मिकब्रेकिंग न्यूज़राजस्थानराज्य

कर्मों से मुक्ति के बिना आत्मा का संसार भ्रमण जारी रहता है : सुकन मुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत शनिवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। इस दौरान गुरुदेव सुकन मुनि ने श्रद्धालुओं को समय के सदुपयोग, कर्मों के प्रभाव और जीवन को सार्थक बनाने के लिए अच्छे कर्म करने का संदेश दिया। वहीं डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र, तारा और विश्वामित्र के प्रसंग के माध्यम से सत्य, त्याग और कर्मों के परिणामों को विस्तार से समझाया।

प्रवचन में सुकन मुनि ने कहा कि जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को जो समय मिलता है, उसका सदुपयोग और साधना करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक अर्थों में साधक कहलाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-दुख और उतार-चढ़ाव कर्मों के कारण आते हैं।

उन्होंने राजा हरिश्चंद्र और तारा के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि कर्मों के प्रभाव के कारण उन्हें भी अपना राज्य छोड़ना पड़ा और अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जब तक कर्मों से छुटकारा नहीं मिलता, तब तक आत्मा का संसार में भ्रमण चलता रहता है।

सुकन मुनि ने श्रद्धालुओं से अच्छे कर्म करने का आह्वान करते हुए कहा कि जीवन में किए गए कर्म ही व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करते हैं। इसलिए मनुष्य को सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए, ताकि उसका जीवन सार्थक और सफल बन सके।

सुकन मुनि ने बताया कि 5 अक्टूबर को युवाचार्य जी का जन्मदिवस आ रहा है। इस अवसर पर एकासना करने की बात कही गई। उन्होंने श्रद्धालुओं से धार्मिक आयोजन में सहभागिता करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि रविवार को लाडनूं से आने वाले बैरागी का अभिनंदन भी किया जाएगा।

पुण्य का घड़ा भरने तक सुख, पुण्य समाप्त होते ही शुरू होता है दुख : डॉ. वरुण मुनि

इससे पूर्व डॉ. वरुण मुनि ने प्रवचन में कहा कि जिस व्यक्ति के पुण्य का घड़ा भरा रहता है, उसका जीवन सुखमय रहता है, लेकिन जब पुण्य कर्म समाप्त होने लगते हैं तो दुखों का दौर शुरू हो जाता है।

उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की कथा के माध्यम से सत्य और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि अनेक कठिनाइयों के बावजूद राजा हरिश्चंद्र ने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा।

डॉ. वरुण मुनि ने कथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि परिस्थितियां इतनी कठिन हो गईं कि तारा ने अपने पति का कर्ज चुकाने के लिए स्वयं को बेचने तक का निर्णय कर लिया। तारा ने हरिश्चंद्र से कहा कि यदि वह स्वयं को बेच दे तो बदले में मिलने वाली राशि से कर्ज चुकाया जा सकता है।

कथा के अनुसार तारा ने कहा कि इससे बड़ा दुख क्या होगा कि एक स्त्री को स्वयं को बेचना पड़े, लेकिन वह अपने पति का कर्ज उतारने और परिवार को संकट से निकालने के लिए इस कठिन निर्णय के लिए तैयार थी।

प्रवचन में बताया गया कि विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र से कहा कि वह अपनी गलती स्वीकार कर लें और माफी मांग लें तो उन्हें क्षमा किया जा सकता है तथा राजपाट भी वापस मिल सकता है। लेकिन हरिश्चंद्र सत्य के मार्ग पर अडिग रहे। उन्होंने झुकना स्वीकार नहीं किया।

तारा ने भी हरिश्चंद्र को समझाया कि कठिन समय में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। उसने कहा कि वह स्वयं को दास बाजार में बेच देगी और विश्वास है कि हरिश्चंद्र मेहनत करके उसे फिर से मुक्त करा लेंगे।

कथा के अनुसार विश्वामित्र की बात सुनकर हरिश्चंद्र बेहोश हो गए। तारा ने उन्हें जगाया और कहा कि यह समय बहुत कीमती है, इसलिए उठिए और आगे चलिए। इसके बाद तारा घर का सामान समेटकर रोहित को साथ लेकर निकल पड़ी।

दास बाजार में पहुंचकर तारा ने स्वयं को दासी के रूप में खरीदने की पेशकश की। वहां मौजूद लोगों ने उसे देखकर आश्चर्य किया कि इतनी सुंदर महिला स्वयं को दासी के रूप में क्यों बेचना चाहती है और उसकी ऐसी क्या मजबूरी है।

तारा ने अपनी कीमत एक हजार स्वर्ण मुद्राएं बताई। इसी दौरान एक ब्राह्मण वहां पहुंचा। बातचीत के बाद उसने बताया कि उसके पास केवल 500 स्वर्ण मुद्राएं हैं। कथा के अनुसार विश्वामित्र ने 500 स्वर्ण मुद्राओं में तारा को बेचने के लिए कहा।

तारा को ब्राह्मण द्वारा खरीदे जाने के बाद वह अपने पुत्र रोहित को हरिश्चंद्र के पास छोड़ने लगी, लेकिन रोहित अपनी मां के साथ जाने के लिए रोने लगा। तारा ने ब्राह्मण से प्रार्थना की कि वह रोहित को भी अपने साथ रख लें। उसने कहा कि बच्चा भी काम करेगा और उसे जो मिलेगा, उसमें से वह अपने बच्चे का पेट भर देगी।

ब्राह्मण तारा की बात मान गया और दोनों को अपने साथ ले गया। दूसरी ओर हरिश्चंद्र को होश आने पर उन्होंने भी स्वयं को बेचने की बात कहना शुरू कर दिया। उनका उद्देश्य था कि वे दास बनकर मेहनत करें और उसी दिन अपना कर्ज उतार दें।

डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि अब कथा में यह महत्वपूर्ण प्रसंग आएगा कि राजा हरिश्चंद्र को कौन खरीदता है और उनके जीवन की अगली परीक्षा किस रूप में सामने आती है। इस प्रसंग को अगले दिन की कथा में विस्तार से बताया जाएगा।

धर्मसभा के दौरान मंत्री प्रकाशचंद कटारिया गुरु दर्शन के लिए पहुंचे। चेन्नई से आए श्रावक विजयराज, धोखराज, तेजराज, चेनराज जी सहित अन्य श्रद्धालुओं का भी स्वागत किया गया। संघ अध्यक्ष पदमचंद ललवानी, संपतराज जी, राजेंद्र मेहता सहित संघ के सदस्यों ने उनका अभिनंदन किया।

कार्यक्रम में बताया गया कि रविवार को संचेती परिवार के जहान लाडनूं में दीक्षा ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर उनकी दीक्षा की अनुमोदना की जाएगी। चातुर्मास कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की सहभागिता लगातार बनी हुई है।

Rajasthan Today

Related Articles

Back to top button