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12 वर्षीय दीक्षार्थी जेहान के वैराग्य भाव की धर्मसभा में हुई अनुमोदना, संघ और महिला मंडल ने किया भावपूर्ण स्वागत

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति जैन भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान रविवार को धर्मसभा में पाली के संचेती परिवार के दोहते दीक्षार्थी जेहान के वैराग्य भाव की अनुमोदना की गई। संघ, महिला मंडल एवं उपस्थित श्रद्धालुओं ने दीक्षार्थी जेहान का भावपूर्ण स्वागत किया। इस अवसर पर उनकी माता नताशा का भी महिला मंडल की ओर से सम्मान किया गया।

धर्मसभा में साधु-संतों ने जेहान के वैराग्य भाव को प्रेरणादायी बताते हुए कहा कि इतनी कम उम्र में सांसारिक मोह-माया का त्याग कर संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प दृढ़ इच्छाशक्ति और धर्म के प्रति जागरूकता का परिचायक है।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि धर्म को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। धर्म जीवन रूपी समुद्र को पार करने की नाव के समान है। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हुए अपने परिवार और आत्मिक शांति से दूर होता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति कितना भी व्यस्त क्यों न हो, यदि वह सप्ताह में एक बार भी परिवार के साथ बैठकर बातचीत नहीं कर सकता तो ऐसी व्यस्तता और ऐसा पैसा किस काम का। उन्होंने कहा कि जीवन में सुख की वास्तविक अनुभूति धर्म और संयम से होती है।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि इतिहास में जितने भी महापुरुष हुए, उन्होंने कठिनाइयों और दुखों को सहन करते हुए संयम का मार्ग अपनाया और अपने जीवन को सफल बनाया। धर्म का पालन वही व्यक्ति कर सकता है, जो धर्म के प्रति जागृत हो। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म के प्रति जागरूक बनने और अगले जन्म में जिन शासन के परिवार का हिस्सा बनने की भावना रखने का आह्वान किया।

धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने राजा हरिश्चंद्र की कथा का भी विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि सत्य की रक्षा के लिए राजा हरिश्चंद्र और रानी तारा ने अनेक कष्ट सहे। दक्षिणा चुकाने के लिए रानी तारा ने स्वयं को भी बेच दिया और इसके बाद हरिश्चंद्र का जीवन भी कठिन परिस्थितियों से गुजरा।

उन्होंने कहा कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अनेक कठिनाइयों का सामना करता है, लेकिन उसका संकल्प उसे आगे बढ़ने की शक्ति देता है। कथा के माध्यम से उन्होंने त्याग, संयम और धर्म के प्रति समर्पण का महत्व समझाया।

डॉ. वरुण मुनि ने दीक्षार्थी जेहान के वैराग्य भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस उम्र में बच्चे सामान्यत: अपनी इच्छाओं और सुविधाओं के लिए माता-पिता से फरमाइश करते हैं, उस उम्र में जेहान ने संयम का मार्ग चुनने का संकल्प लिया है। उन्होंने कहा कि यह भाव अपने आप में प्रेरणादायी है।

उन्होंने कहा कि संघ के अनेक संतों ने भी कम उम्र में दीक्षा लेकर तप, त्याग और तपस्या के माध्यम से आचार्य पद तक की यात्रा की है। उन्होंने दीक्षार्थी जेहान के उज्ज्वल संयम जीवन की मंगलकामना की।

गुरुदेव सुकन मुनि ने दीक्षार्थी जेहान के नाम का अर्थ बताते हुए कहा कि जेहान यानी हिम्मत वाला। उन्होंने कहा कि जेहान आज दीक्षा भाव लेकर उपस्थित हुआ है। भगवान महावीर के अनुसार संयम जीवन की ओर आगे बढ़ने की भावना उम्र से नहीं, बल्कि भीतर जागृत वैराग्य से जुड़ी होती है।

उन्होंने बताया कि जेहान ने कम उम्र में ही उपवास एवं तपस्या की साधना की तथा गुरु की संगत में रहते हुए उसके भीतर वैराग्य की भावना और मजबूत हुई। उन्होंने कहा कि सफेद वस्त्र पर कोई भी रंग आसानी से चढ़ जाता है, लेकिन जेहान ने सांसारिक रंगों के बजाय वैराग्य का रंग चुना है।

सुकन मुनि ने कहा कि जिनके जीवन में भौतिकता और मोह-माया का प्रभाव कम हो जाता है, वे आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कामना की कि जेहान आगे चलकर जिनवाणी को जन-जन तक पहुंचाने और तेरापंथ धर्म की ख्याति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

दीक्षार्थी जेहान की माता नताशा ने बताया कि महाश्रमणजी के चातुर्मास के बाद जेहान पांच दिन तक उनके सान्निध्य में रहा। इसी दौरान 12 वर्ष की उम्र में उसके भीतर वैराग्य की भावना जागृत हुई और उसने दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की।

परिवार ने उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन उसका संकल्प लगातार दृढ़ होता गया। नताशा ने बताया कि जेहान की एक जुड़वा बहन भी है, लेकिन उसने धीरे-धीरे परिवार और सांसारिक मोह का त्याग कर गुरु के सान्निध्य में रहने का मार्ग चुना।

उन्होंने बताया कि 30 नवंबर 2024 को जेहान घर से निकला और इसके बाद वापस घर नहीं लौटा। गुरु के सान्निध्य में रहते हुए उसने साधु जीवन की दिनचर्या को अपनाया। धार्मिक गतिविधियों और तपस्या के प्रति उसकी भावना लगातार मजबूत होती गई। जेहान ने गुरु के साथ करीब 1800 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर लाडनूं तक का सफर भी तय किया। अब वह दीक्षा के लिए तैयार हो चुका है और आगामी 18 जनवरी को दीक्षा लेने की तैयारी है।

धर्मसभा में दीक्षार्थी जेहान ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने हमें जिनवाणी दी, अब हमने उनके प्रति क्या किया। उन्होंने कहा कि वह अपना पूरा जीवन तेरापंथ धर्म के आचार्य के चरणों में समर्पित करना चाहता है।

जेहान ने कहा कि उसने संयम को अपना जीवन समर्पित किया है और परीक्षा में सफल होकर दीक्षा लेने जा रहा है। उसका उद्देश्य जिन शासन के प्रति अपने ऋण को चुकाना तथा श्रमण संघ और तेरापंथ धर्म की ख्याति को आगे बढ़ाना है।

धर्मसभा के दौरान संघ की ओर से दीक्षार्थी जेहान का बहुमान किया गया। महापौर नमिता विकास बुबकिया, महेंद्र बोहरा, मंत्री प्रकाश कटारिया सहित संघ के महेंद्र जैन, केवलचंद जी धोका, संपत जी, हुक्मीचंद, जसवंत कुमार संचेती सहित अन्य पदाधिकारियों एवं श्रद्धालुओं ने दीक्षार्थी का माला पहनाकर स्वागत किया।

त्रिशला महिला मंडल की पदाधिकारियों ने दीक्षार्थी जेहान की माता नताशा का भी सम्मान किया। इस अवसर पर चेन्नई और बेंगलुरु सहित विभिन्न स्थानों से पहुंचे गुरु भक्तों का भी संघ की ओर से स्वागत किया गया।

धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने दीक्षार्थी जेहान के वैराग्य भाव की अनुमोदना करते हुए उसके आगामी संयम जीवन के लिए मंगलकामनाएं प्रेषित कीं। पूरे आयोजन के दौरान धर्म, संयम, त्याग और वैराग्य का भाव प्रमुख रूप से दिखाई दिया।

Rajasthan Today

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