google.com, pub-3021598506696014, DIRECT, f08c47fec0942fa0
Paliदेशधार्मिकब्रेकिंग न्यूज़राजस्थानराज्य

समय का सदुपयोग और प्रमाद का त्याग ही आत्मकल्याण का मार्ग: सुकन मुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत गुरुवार को धर्मसभा का आयोजन हुआ। प्रवचन के दौरान पर्वतक गुरुदेव सुकन मुनि ने भगवान महावीर की वाणी को जगत के कल्याण का मार्ग बताते हुए श्रद्धालुओं से उसे सुनने के साथ अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समय अत्यंत मूल्यवान है। व्यक्ति को प्रमाद में समय गंवाने के बजाय पुरुषार्थ, साधना और आत्मकल्याण के कार्यों में लगाना चाहिए। जीवन में सजगता और अनुशासन अपनाने से ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि व्यक्ति को हर क्षण जागरूक रहना चाहिए, क्योंकि समय तेजी से बीत जाता है। आंखें बंद कर खोलने के बीच भी समय निकल जाता है, इसलिए जीवन के अनमोल क्षणों को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। जप और तप के माध्यम से आत्मा को पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। पुरुषार्थ के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि साधना और गुरु दर्शन के लिए श्रद्धालु जोधपुर, बेंगलुरु, सूरत और ब्यावर सहित विभिन्न स्थानों से पहुंचते हैं। यह उनकी आस्था और धर्म के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

इसके बाद डॉ. वरुण मुनि ने भगवान महावीर के उपदेशों और आगम के अध्ययन के संदर्भ में श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने हजारों वर्ष पहले जीवन को सही दिशा देने वाली जो शिक्षाएं दीं, वे आज भी प्रासंगिक हैं। इन शिक्षाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब व्यक्ति उन्हें केवल सुनने तक सीमित न रखकर अपने आचरण में शामिल करे।

डॉ. वरुण मुनि ने गौतम स्वामी के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि साधु जीवन अपनाने के बाद भी प्रमाद से दूर रहना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के लिए सजगता, निरंतर अभ्यास और आत्मअनुशासन जरूरी हैं। व्यक्ति जब प्रमाद का त्याग करता है, तभी ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को समझने की दिशा में आगे बढ़ता है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक साधना के लिए दूसरों का इंतजार नहीं करना चाहिए। कोई साथ दे या न दे, व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ रहना चाहिए। प्रतिक्रमण और अन्य धार्मिक गतिविधियों में नियमित रूप से शामिल होने की भावना रखनी चाहिए। साधना के मार्ग पर संकोच छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि कितने लोग साथ हैं या कितने लोग धर्मसभा में उपस्थित हैं।

प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने आगम के ग्यारहवें अध्ययन का उल्लेख करते हुए ज्ञान, विनय और साधना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अभिमान, क्रोध, प्रमाद और लोभ जैसे विकार व्यक्ति की ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए विनम्रता, विवेक और सीखने की भावना आवश्यक है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धार्मिक शिक्षाओं को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें बताए गए सिद्धांतों को व्यवहार में लाना भी जरूरी है। जीवन में छोटी-छोटी गलतियों और प्रमाद को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। व्यक्ति अपने आचरण में सुधार लाकर स्वयं के साथ दूसरों के लिए भी हितकारी बन सकता है।

डॉ. वरुण मुनि ने दैनिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि धर्म का पालन केवल बड़े अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। घर और व्यवहार में भी ऐसी आदतें अपनाई जा सकती हैं, जिनसे दूसरों को लाभ पहुंचे। उन्होंने अनावश्यक वस्तुओं को जमा करने के बजाय उपयोगी वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाने जैसी भावना विकसित करने पर जोर दिया। उनके अनुसार, जीवन में परोपकार और दूसरों के कल्याण की भावना रखना भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि आगम में बताई गई शिक्षाएं व्यक्ति को जागरूक करने वाली हैं। यदि मनुष्य इन शिक्षाओं में से किसी एक को भी अपने जीवन में पूरी तरह उतार ले, तो उसके आचरण और सोच में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। विवेक, विनय और संयम जीवन को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम से पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने भी धर्म और ज्ञान से जुड़ी बातें बताते हुए श्रद्धालुओं को सदाचार और आध्यात्मिक जीवन की प्रेरणा दी। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचनों का श्रवण किया।

कार्यक्रम के अंत में संघ के उपमंत्री होशियार राज मेहता ने संघ की ओर से बाहर से आए अतिथियों का स्वागत करवाया। चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान दिए गए प्रवचनों में समय के सदुपयोग, प्रमाद के त्याग, ज्ञान की प्राप्ति, विनय और आत्मकल्याण पर विशेष जोर दिया गया।

Rajasthan Today

Related Articles

Back to top button