
पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान बुधवार को गुरुदेव सुकनमुनि ने श्रद्धालुओं को विनय, संयम, त्याग और आत्मकल्याण का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि सच्चे धर्म का आधार विनय है। विनम्रता और विवेक के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक गुणों का विकास कर सकता है। भगवान महावीर की शिक्षाएं मनुष्य को आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने और जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा देती हैं।
गुरुदेव ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में माता-पिता और बड़ों के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए। जो व्यक्ति विवेक के साथ अपने माता-पिता को प्रणाम करता है और उनका आदर करता है, वह संस्कारों का पालन करता है। धार्मिक शिक्षाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब उन्हें केवल सुनने तक सीमित न रखकर अपने आचरण में उतारा जाए।
गुरुदेव सुकनमुनि ने भगवान महावीर की अंतिम शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए आत्मकल्याण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आत्मा का खजाना अनमोल है और उसमें ऐसे मार्ग निहित हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। विनय, विवेक और सदाचार के माध्यम से आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने व्यवहार में विनम्रता रखनी चाहिए। माता-पिता, गुरुजनों और बड़ों के प्रति सम्मान प्रकट करने में संकोच नहीं करना चाहिए। जीवन में अच्छे संस्कार और विनय का भाव व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करते हैं।

गुरुदेव ने कहा कि धर्मसभा में जिनवाणी सुनना तभी सार्थक है, जब उसके संदेश को जीवन में अपनाया जाए। यदि व्यक्ति समय रहते धार्मिक शिक्षाओं को समझकर अपने आचरण में सुधार करे, तो वह अनेक गलतियों से बच सकता है।
उन्होंने व्यवहार की शुद्धता पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति के शब्दों और मन के भावों में एकरूपता होनी चाहिए। केवल मीठा बोलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन में दया, करुणा और दूसरों के प्रति सद्भाव होना भी आवश्यक है। आगम की शिक्षाओं को सुनते ही जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के दौरान गुरुदेव सुकनमुनि ने दीपावली के अवसर पर तपस्या और संयम के महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने भगवान महावीर के अंतिम समय और उनके तपमय जीवन का स्मरण करते हुए आत्मकल्याण की भावना को मजबूत करने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि धार्मिक साधना का उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और मोह-माया से दूरी बनाना है। तपस्या के प्रति श्रद्धा रखते हुए व्यक्ति को अपनी क्षमता, स्वास्थ्य और धार्मिक मार्गदर्शन के अनुरूप साधना करनी चाहिए।
इससे पूर्व डॉ. वरुण मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के 17वें अध्याय पर प्रवचन दिया। उन्होंने आहार, संयम, साधु जीवन की मर्यादा और आत्मकल्याण के विषयों पर विस्तार से विचार रखे।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में आहार का विशेष महत्व है। भोजन के प्रति आसक्ति और असंयम साधना के मार्ग में बाधा बन सकते हैं। इसलिए साधु और श्रावक दोनों को अपनी धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप संयमित जीवनशैली अपनानी चाहिए।
डॉ. वरुण मुनि ने जैन धर्म के महापुरुषों की तपस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि अनेक संतों ने कठोर साधना और उपवास के माध्यम से आत्मसंयम के आदर्श प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को बाहरी दिखावे के बजाय आत्मशुद्धि और त्याग की भावना पर ध्यान देने की प्रेरणा दी।
डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि व्यक्ति को सबसे पहले अपने आत्मकल्याण का लक्ष्य स्पष्ट करना चाहिए। भगवान महावीर की शिक्षाओं के अनुरूप स्वयं की आत्मा के उत्थान का प्रयास करना आवश्यक है। दूसरों को धर्म से जोड़ने का उद्देश्य भी सेवा, सद्भाव और सही मार्गदर्शन पर आधारित होना चाहिए।
उन्होंने साधु-संतों के प्रति सम्मान, आचार्य के प्रति श्रद्धा और धार्मिक मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया। उनके अनुसार, किसी के प्रति अनावश्यक निंदा या अपमानजनक व्यवहार से बचना चाहिए। धार्मिक जीवन में सम्मान, विनय और अनुशासन का विशेष महत्व है।
प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने साधु जीवन से जुड़ी दिनचर्या और अनुशासन के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधु-संतों को अपने समय का सदुपयोग करते हुए साधना और धार्मिक कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहना चाहिए।

उन्होंने पर्याप्त विश्राम, संयमित आहार, स्वच्छता और आसपास के वातावरण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता बताई। जैन धर्म में जीवदया का विशेष महत्व है, इसलिए चलते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि किसी जीव को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे।
उन्होंने कहा कि साधु जीवन का प्रत्येक कार्य मर्यादा और जागरूकता के साथ होना चाहिए। उत्तराध्ययन सूत्र के 17वें अध्याय में साधु-संतों के लिए अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएं दी गई हैं, जो अनुशासित और संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।
प्रवचन कार्यक्रम के बाद नाबरिया परिवार की ओर से आधे घंटे तक नवकार मंत्र का जाप किया गया। इस जाप की प्रभावना संतोष देवी एवं कांतिलाल जी की ओर से रखी गई थी। नवकार मंत्र के सामूहिक जाप से कार्यक्रम में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री प्रकाश कटारिया ने रानी गांव से आए गुरु भक्त नथमल जी नाडोल का परिचय कराया। संघ के अध्यक्ष पदमचंद ललवानी ने उनका स्वागत किया। इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों और गुरु भक्तों का भी संघ की ओर से स्वागत-सम्मान किया गया।
चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान संतों ने श्रद्धालुओं को भगवान महावीर की शिक्षाओं के अनुरूप विनय, संयम, तप, जीवदया और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया।



