पर्यूषण पर्व का पांचवां दिन, सुकन मुनि बोले- पांच इंद्रियों पर नियंत्रण और सेवा भाव से संवरता है जीवन

पाली : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन श्रद्धा, तपस्या, सेवा और दान का संदेश दिया गया। धर्मसभा में गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि पर्यूषण पर्व का पांचवां दिन व्यक्ति को अपनी पांच इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का संदेश देता है। यदि मनुष्य अपनी इंद्रियों पर संयम करना सीख ले तो उसका जीवन सही दिशा में आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में ज्ञान के साथ सेवा भाव का होना भी बेहद जरूरी है। सेवा धर्म है और वृद्धजनों, रोगियों, बच्चों तथा संतों की सेवा करना मानव जीवन को महान बनाता है। जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ और नाम की अपेक्षा के सेवा करता है, उसका जीवन सार्थक हो जाता है।
सुकन मुनि ने कहा कि जीवन को स्वच्छ और श्रेष्ठ बनाने के लिए सेवा भाव को अपनाना चाहिए। समाज में जब किसी व्यक्ति की पहचान एक सेवा भावी व्यक्ति के रूप में होती है और वह आने वाले संतों की सेवा करता है, तो उसके जीवन को नई दिशा मिलती है।
उन्होंने कहा कि सेवा के माध्यम से जीवन महान और मोक्षगामी बन सकता है। तपस्या और नवकार मंत्र जाप का भी जीवन में विशेष महत्व है। यह देह एक दिन मिट्टी में मिल जाएगी, इसलिए मनुष्य को जीवन में रहते हुए धर्म, तपस्या, संयम और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तपस्या करने वाले व्यक्ति को समाज में सम्मान मिलता है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति के जीवन में वैराग्य और त्याग का भाव पैदा हो।

इससे पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए दान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंद की आवश्यकता को समझकर उसकी सहायता करना ही सच्चा दान है।
उन्होंने चार प्रकार के दान का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें आहार दान, ज्ञान दान, औषध दान और अभय दान प्रमुख हैं।
साध्वी ने आहार दान का उदाहरण देते हुए बताया कि एक ग्वाले ने साधु को खीर का दान दिया था। वहीं ज्ञान दान का उदाहरण भगवान महावीर और गौतम स्वामी के प्रसंग से समझाया। भगवान महावीर ने गौतम स्वामी को ज्ञान प्रदान किया और वे ज्ञानी बने।
उन्होंने औषध दान का उदाहरण रेवती के प्रसंग से देते हुए कहा कि किसी पीड़ित व्यक्ति की पीड़ा दूर करना भी बड़ा पुण्य कार्य है। इसी तरह अभय दान का भी विशेष महत्व बताया गया।
साध्वी प्रीतिसुधा ने कहा कि जब भी दान करें तो खुले मन से करें और बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा न रखें। किसी रोगी की पीड़ा दूर करना, किसी जरूरतमंद की मदद करना और किसी भयभीत व्यक्ति को सुरक्षा का भाव देना भी दान की श्रेणी में आता है।
उन्होंने कहा कि वृक्ष की शोभा उसके पत्तों से और इंसान की शोभा उसके ज्ञान से होती है, जबकि धनवान व्यक्ति की वास्तविक शोभा उसके दान और सेवा भाव से होती है।

इस अवसर पर डॉ. वरुण मुनि ने कल्पसूत्र वाचन के अंतिम पाठ का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बलभद्र और हिरण की कथा के माध्यम से जीवन में दुश्मनी को साथ लेकर नहीं चलने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में बुराइयों को छोड़कर धर्म की ओर बढ़ना चाहिए। परिवार में बच्चों के गलत रास्ते पर जाने की स्थिति में भी उन्हें सही संस्कार और धर्म के मार्ग पर लाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पर्यूषण पर्व के इस दिन को सेवा के दिवस के रूप में देखते हुए सभी को संघ में सेवा करनी चाहिए, लेकिन सेवा के बदले नाम या सम्मान की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। उन्होंने गुप्त दान को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दान ऐसा हो, जिसमें दिखावे के बजाय किसी जरूरतमंद का वास्तविक भला हो।
दोपहर में त्रिशला महिला मंडल सहित विभिन्न महिला मंडलों की ओर से भगवान महावीर के जन्मोत्सव का आयोजन किया गया। इस दौरान श्रद्धालु महिलाओं ने उत्साह और भक्ति के साथ जन्मोत्सव मनाया।
इस अवसर पर महेश मुनि ने संगीतमय प्रस्तुति देते हुए “त्रिशला के आंगणिया में झूले, पालने में सोना रो चढ़ियो, पालणो रेशम की डोरी…” जैसे भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी। गीत-संगीत के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
महिलाओं ने पारंपरिक रूप से सज-धजकर और मुकुट धारण कर नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से भगवान महावीर के जन्म प्रसंग को जीवंत किया। जन्मोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर के जन्म की खुशियां मनाईं और धार्मिक वातावरण में कार्यक्रम का आनंद लिया।
रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन धर्मसभा के दौरान संतों ने श्रद्धालुओं को स्पष्ट संदेश दिया कि केवल धार्मिक अनुष्ठान ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इंद्रिय संयम, सेवा, दान, ज्ञान, तपस्या और त्याग को जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है।
धर्मसभा में दिए गए संदेशों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के साथ-साथ समाज और जरूरतमंदों की सेवा के लिए प्रेरित किया। वहीं भगवान महावीर के जन्मोत्सव के आयोजन ने पूरे कार्यक्रम को भक्ति और उल्लास से भर दिया।



