पाली में डॉ. वरुण मुनि का प्रवचन, 22 परीषहों पर विजय से सफल बनता है जीवन, संयम और तप का बताया महत्व

पाली : श्री वर्तमान स्थानकवासी जैन संघ के तत्वावधान में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के अंतर्गत गुरुवार को डॉ. वरुण मुनि ने प्रवचन देते हुए जीवन में संयम, धैर्य, सहनशीलता और तप के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों और कष्टों से घबराने के बजाय उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करने तथा आत्मबल के साथ उनका सामना करने का प्रयास करना चाहिए। व्यक्ति अपने जीवन में संयम और सकारात्मक भाव बनाए रखे तो अनेक परिस्थितियों में स्वयं को संभाल सकता है।
डॉ. वरुण मुनि ने जैन धर्म में वर्णित 22 परीषहों का उल्लेख करते हुए कहा कि साधु जीवन में इन परीषहों को सहन करने और उन पर विजय प्राप्त करने का विशेष महत्व है। उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि कठिन परिस्थितियों में मन को विचलित होने से बचाना और अपने धर्म व सिद्धांतों पर दृढ़ रहना ही साधना का महत्वपूर्ण पक्ष है।
प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि जीवन में कई प्रकार के कष्ट और प्रतिकूल परिस्थितियां आती हैं। इनसे बचने की कोशिश करने के बजाय व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार धैर्य और सहनशीलता विकसित करनी चाहिए। उन्होंने भूख और प्यास जैसे शारीरिक कष्टों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि भोजन मिलने में देरी हो जाए तो मन में क्रोध या शिकायत रखने के बजाय संयम का भाव बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तप और साधना का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि मन को स्थिर रखना, इच्छाओं पर नियंत्रण करना और आत्मिक शक्ति को विकसित करना भी है। साधना के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए सरलता, धैर्य और अनुशासन आवश्यक हैं। जीवन में आने वाली परिस्थितियों को समभाव से स्वीकार करने की भावना व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है।

डॉ. वरुण मुनि ने प्रवचन के दौरान लगभग 250 वर्ष पुराने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए आचार्य रघुनाथ जी महाराज से जुड़ी घटना सुनाई। उन्होंने बताया कि उस समय जावोर और जोजावर क्षेत्र में यतियों का प्रभाव था। आचार्य रघुनाथ जी महाराज जालौर की ओर से जैतारण के निकट क्षेत्र में आए थे। उनके एक शिष्य वीर और गुरु के प्रति समर्पित बताए जाते थे।
प्रसंग के अनुसार, यात्रा के दौरान संतों को प्यास लगी तो पानी की व्यवस्था करने की बात सामने आई। इसी दौरान एक व्यक्ति पानी लेकर आया। कथा में बताया गया कि पानी को लेकर विवाद खड़ा किया गया और आरोप लगाया गया कि उसमें मांस का पानी मिलाया गया है, जिससे संतों के धर्म और मर्यादा पर सवाल उठाए जा सकें।
डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि इस घटना के बाद वहां लोग एकत्रित हो गए और पानी की वास्तविकता को लेकर चुनौती दी गई। कथा के अनुसार, गुरु की लाज रखने की प्रार्थना के बाद जब पात्र खोला गया तो उसमें मांस मिला पानी होने के बजाय मीठे चावल दिखाई दिए। इस घटना से वहां मौजूद लोग आश्चर्यचकित रह गए। मुनि ने इस प्रसंग के माध्यम से गुरु के प्रति श्रद्धा, धर्म में विश्वास और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने का संदेश दिया।
प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि धर्म का पालन केवल शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे अपने आचरण में भी उतारना जरूरी है। व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से विचलित नहीं होना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को संयमित जीवन अपनाने, आत्मचिंतन करने और आध्यात्मिक साधना के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा दी।
उन्होंने जैन परंपरा में वर्णित परीषहों के महत्व को समझाते हुए बताया कि नियमित अध्ययन, ज्ञान और साधना से व्यक्ति की स्मरण शक्ति तथा आत्मिक दृढ़ता विकसित होती है। धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए धैर्य और निरंतर अभ्यास आवश्यक हैं।
कार्यक्रम में इससे पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने गीता ज्ञान के संदर्भ में विस्तार से विचार रखे। उन्होंने ब्रह्मा, नारद आदि से जुड़े प्रसंगों का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों की जानकारी दी।
चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान संघ के उपमंत्री होशियार राज मेहता ने पीपाड़ से पधारे शुभकरण जी लुणावत का स्वागत संघ अध्यक्ष पदमचंद ललवानी से करवाया। वहीं, मंत्री प्रकाश कटारिया ने बाहर से आए अतिथियों का अनुमोदन किया। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने प्रवचन का लाभ लिया और धर्म, संयम तथा आत्मिक साधना से जुड़े संदेशों को आत्मसात करने का प्रयास किया।



