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पाली चातुर्मास प्रवचन, ‘जीवन नश्वर है, समय रहते अच्छे कर्म और आत्मचिंतन को बनाएं आधार’

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत शनिवार को धर्मसभा में जीवन की नश्वरता, मानवता, अतिथि सत्कार, संयम और आत्मकल्याण जैसे विषयों पर प्रवचन हुए। पर्वर्तक गुरुदेव सुकन मुनि ने भगवान महावीर के संदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन स्थायी नहीं है। बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु जीवन के सत्य हैं, इसलिए व्यक्ति को समय रहते अच्छे कर्म, तप, ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

साध्वी प्रीतिसुधा ने अतिथि सत्कार, करुणा और उदारता का महत्व बताते हुए राजा भरत चक्रवर्ती का प्रसंग सुनाया। वहीं डॉ. वरुण मुनि ने चौथे अध्ययन के संदर्भ में समझाया कि जीवन में जो समय और अवसर बीत जाते हैं, वे दोबारा नहीं लौटते। इसलिए मोह, अहंकार, लालच और अनावश्यक हस्तक्षेप से दूर रहकर वर्तमान को बेहतर बनाना जरूरी है। प्रवचनों को सुनने के लिए विभिन्न स्थानों से गुरु भक्त भी पहुंचे।

गुरुदेव सुकन मुनि ने कहा कि भगवान महावीर का संदेश हमें जीवन की वास्तविकता का बोध कराता है। मनुष्य अमर नहीं है और एक दिन उसे वृद्धावस्था, रोग तथा जीवन की अन्य कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद कई लोग जीवन के महत्व को समझने के बजाय बीते हुए समय और अनावश्यक बातों में उलझे रहते हैं।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति आत्मचिंतन करता है, वही जीवन की वास्तविक कीमत समझ पाता है। आत्मा से महात्मा और महात्मा से परमात्मा बनने का मार्ग अच्छे विचारों, सद्कर्मों और आत्मशुद्धि से होकर गुजरता है। जीवन को केवल सांसारिक इच्छाओं में व्यतीत करने के बजाय उपवास, तप, ध्यान और संयम जैसी धार्मिक साधनाओं में लगाना चाहिए।

गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाना नहीं, बल्कि अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाना भी है। मनुष्य के पास जो समय है, उसका सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि बीता हुआ समय वापस नहीं आता। उन्होंने नियमित धर्मश्रवण और आत्मकल्याण की दिशा में प्रयास करने का संदेश दिया।

इससे पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने अतिथि सत्कार और उदार व्यवहार पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि घर पर आने वाले अतिथि का सम्मान करना चाहिए। किसी के आगमन पर उसे अनचाहा समझना या अपमानजनक व्यवहार करना उचित नहीं है। व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार अतिथि का स्वागत करना चाहिए और जरूरतमंद के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।

उन्होंने राजा भरत चक्रवर्ती का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि राजा प्रतिदिन अपने महल में मुनिराज के आगमन की प्रतीक्षा करते थे। एक दिन जब मुनिराज नहीं पहुंचे तो वे बहुत दुखी हुए और उन्होंने भोजन ग्रहण नहीं करने का भाव व्यक्त किया। बाद में मुनिराज के आने पर राजा ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और भोजन करवाया।

साध्वी प्रीतिसुधा ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अतिथि सत्कार केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि विनम्रता, श्रद्धा और सेवा भावना का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बल्कि दूसरों को देते हैं। इसी तरह मनुष्य को भी अपने सामर्थ्य के अनुसार दूसरों के काम आना चाहिए। जरूरतमंदों की सहायता और अतिथि का सम्मान करने से जीवन में उदारता और पुण्यभाव विकसित होता है।

डॉ. वरुण मुनि ने चौथे अध्ययन के प्रसंग में जीवन की अनित्यता और मनुष्य को सचेत करने वाले संदेशों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने समझाया कि कई वस्तुओं के टूटने पर उन्हें जोड़ा या सुधारा जा सकता है, लेकिन जीवन में बीता हुआ समय वापस नहीं लाया जा सकता। बचपन, जवानी और बीते हुए दिन दोबारा नहीं आते। मृत्यु के बाद जीवन को पहले जैसा कर पाना भी संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर धन-संपत्ति, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं को स्थायी मानकर उनके पीछे लगा रहता है, जबकि जीवन की वास्तविकता इससे अलग है। बड़ी से बड़ी आर्थिक क्षमता भी उम्र को रोकने या बीते समय को वापस लाने की गारंटी नहीं दे सकती। इसलिए व्यक्ति को वर्तमान समय का महत्व समझना चाहिए।

डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि शरीर हमेशा एक जैसा नहीं रहता। उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक क्षमताएं कम हो सकती हैं और व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है। ऐसे में जीवन को केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अच्छे आचरण, आत्मसंयम और मानसिक शांति से भी समृद्ध बनाना चाहिए।

डॉ. वरुण मुनि ने जीवन के उत्तरार्ध को शांतिपूर्ण और सार्थक बनाने के लिए चार व्यवहारिक सूत्र बताए। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति को अपने व्यवहार में सरलता लानी चाहिए और परिवार में अनावश्यक तनाव पैदा करने से बचना चाहिए।

उन्होंने प्रमुख रूप से ये बातें समझाईं—
अनावश्यक हस्तक्षेप से बचें: दूसरों के निजी मामलों में बिना जरूरत दखल न दें।
बिना मांगे सलाह न दें: परिवार के सदस्यों को अपनी बात और निर्णय रखने का अवसर दें।
टोका-टोकी कम करें: छोटी-छोटी बातों पर बार-बार रोकने या टोकने के बजाय समझदारी से व्यवहार करें।
मोह और अहंकार कम करें: रिश्तों में जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएं रखने के बजाय सहजता और संतुलन बनाए रखें।

उन्होंने कहा कि जीवन में शांति पाने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले अपने भीतर बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए। दुनिया को अपनी इच्छा के अनुसार बदलना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन अपने विचारों और व्यवहार को बेहतर बनाया जा सकता है।

प्रवचन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन कमाने और सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है, लेकिन वास्तविक सुख केवल बाहरी साधनों से प्राप्त नहीं होता। सुख की तलाश अपने भीतर करनी चाहिए। व्यक्ति को लालच, अहंकार और अनावश्यक मोह से दूर रहकर आत्मचिंतन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने और शरीर का साथ कम होने पर व्यक्ति को अपनी आत्मा तथा जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए। भौतिक संपत्ति जीवन की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है। इसलिए धन के साथ-साथ सदाचार, संयम और मानसिक शांति को भी महत्व देना जरूरी है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रमाद से दूर रहने, अपने आचरण में सुधार करने और उपलब्ध समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा दी।

धर्मसभा के दौरान गुरुदेव सुकन मुनि ने श्रद्धालुओं को पचक्खाण (धार्मिक संकल्प) करवाया। साथ ही 21 अक्टूबर को आचार्य गुरुदेव भुधर जी महाराज की जयंती के अवसर पर सभी श्रद्धालुओं से उपवास रखने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में मंत्री प्रकाश कटारिया ने संघ अध्यक्ष पदमचंद ललवानी और पदाधिकारियों के माध्यम से चेन्नई, बेंगलुरु, नाथद्वारा, सिकंदराबाद सहित विभिन्न स्थानों से आए अतिथियों और गुरु भक्तों का स्वागत करवाया।

चातुर्मास कार्यक्रम में हुए प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन की नश्वरता को समझने, अच्छे कर्म करने, अतिथि सत्कार अपनाने, मोह-अहंकार कम करने और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई।

Rajasthan Today

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