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भोग-विलास से नहीं, त्याग और संयम से मिलता है आत्मकल्याण : डॉ. वरुण मुनि

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में आयोजित चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान रविवार को धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने भगवान नेमिनाथ के जीवन प्रसंग के माध्यम से वैराग्य, अहिंसा और संयम का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भोग-विलास में भटकता रहता है, उसे योग और आत्मकल्याण का मार्ग नहीं मिल पाता। जीवन में भौतिक आकर्षणों और मोह-माया से जितना अधिक जुड़ाव होगा, आत्मिक उन्नति का मार्ग उतना ही कठिन होता जाएगा।

डॉ. वरुण मुनि ने प्रवचन के दौरान कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए, जिनसे आत्मा का कल्याण हो। भौतिक बंधनों से मुक्त होने के लिए त्याग, तपस्या और नियमों का पालन आवश्यक है। साधु जीवन में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति संयम और अनुशासन के माध्यम से सिद्धि की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में केवल अपने भौतिक सुखों के बारे में नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति भी संवेदनशीलता और करुणा का भाव रखना चाहिए।

प्रवचन में डॉ. वरुण मुनि ने भगवान नेमिनाथ के जीवन से जुड़ी प्रेरक कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि भगवान नेमिनाथ का विवाह राजकुमारी राजुल से तय हुआ था। विवाह की तैयारियां भव्य स्तर पर हुईं और बारात के साथ अनेक राजा-महाराजा भी पहुंचे थे। लेकिन विवाह स्थल पर पहुंचने से पहले नेमिनाथ ने पशुओं के करुण रुदन की आवाज सुनी।

जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो बताया गया कि विवाह समारोह में भोजन की व्यवस्था के लिए इन पशुओं की बलि दी जाएगी। यह सुनकर नेमिनाथ का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने विचार किया कि जिस विवाह के लिए निर्दोष जीवों की हत्या की जा रही हो, ऐसा विवाह उन्हें स्वीकार नहीं है। इसी प्रसंग ने उनके भीतर वैराग्य की भावना को जागृत कर दिया और उन्होंने विवाह का त्याग कर संयम का मार्ग अपना लिया।

डॉ. वरुण मुनि ने राजकुमारी राजुल के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि जब उन्हें नेमिनाथ के वैराग्य धारण करने की जानकारी मिली तो वे अत्यंत व्यथित हुईं। बाद में उन्होंने भी सांसारिक जीवन के मोह को त्यागकर संयम के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

उन्होंने भगवान नेमिनाथ के छोटे भाई रथनेमि और राजुल से जुड़े प्रसंग का भी उल्लेख किया। कथा के माध्यम से उन्होंने बताया कि मनुष्य के भीतर मोह और आकर्षण की भावनाएं बार-बार उत्पन्न हो सकती हैं, लेकिन आत्मज्ञान और दृढ़ संकल्प से उन पर विजय प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में तीर्थंकरों के आदर्शों को अपनाएं और जुआ-सट्टे जैसी बुराइयों से दूर रहकर धर्म, संयम और सदाचार में मन लगाएं।

इसके बाद गुरुदेव सुकन मुनि ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मा के कल्याण के लिए ज्ञान, त्याग और धर्म के मार्ग को जीवन में धारण करना आवश्यक है। आगम में मोक्ष प्राप्ति के मार्गों का उल्लेख किया गया है। मनुष्य को अपने जीवन में दान और त्याग की भावना विकसित करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि घर पर आने वाले अतिथियों का आदर-सत्कार करना चाहिए तथा संतों की सेवा और धर्म के प्रति समर्पण से जीवन में आनंद और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। धर्म और सेवा के कार्यों को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की भावना से करना चाहिए।

धर्मसभा में बताया गया कि 3 नवंबर को महासती तेज कंवर जी महाराज तथा 4 नवंबर को डॉ. अमरीश मुनि की नवमी पुण्यतिथि के अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन होंगे। श्रद्धालुओं से इन कार्यक्रमों में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेकर धर्मलाभ लेने का आह्वान किया गया। रविवार को रवि पुष्य नक्षत्र का विशेष संयोग होने का भी उल्लेख किया गया।

कार्यक्रम के दौरान मंत्री प्रकाश कटारिया ने बाहर से पधारे अतिथियों का स्वागत किया। भीलवाड़ा ब्राह्मण परिवार के गांव के बिहारीलाल जी अध्यापक एवं कैलाशचंद शर्मा का संघ के संपतजी और प्रकाश चोपड़ा द्वारा स्वागत करवाया गया। वहीं गुरुभक्त तेजसिंह एवं लक्ष्मीनारायणजी का स्वागत प्रवीण धारीवाल ने किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजबंधु उपस्थित रहे।

Rajasthan Today

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