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डॉ. अमरीश मुनि निराला की पुण्यतिथि पर गुणगान, महेश मुनि की जन्म जयंती पर श्रद्धालुओं ने की अनुमोदना

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत मंगलवार को धर्मसभा में तप, त्याग, संयम और गुरु भक्ति के प्रसंगों के साथ डॉ. अमरीश मुनि निराला की पुण्यतिथि मनाई गई। इस अवसर पर संतों ने उनके जीवन, साधना, गुरु सेवा और धर्म के प्रति समर्पण का स्मरण करते हुए गुणगान किया। वहीं युवा मनीषी एवं संगीत सम्राट महेश मुनि की जन्म जयंती पर भी श्रद्धालुओं ने अनुमोदना व्यक्त की। गुरुदेव सुकन मुनि ने दोनों संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया।

धर्मसभा में डॉ. वरुण मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के 24वें और 25वें अध्ययन का उल्लेख करते हुए इनके संदेशों को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने साधु जीवन में सावधानी, अनुशासन और संयम का विशेष महत्व बताया है। मनुष्य को अपने व्यवहार, वाणी और दैनिक क्रियाकलापों में विवेक रखना चाहिए।

डॉ. वरुण मुनि ने बताया कि जीवन में प्रत्येक कार्य करते समय सावधानी और मर्यादा का पालन करना आवश्यक है। साधु-साध्वियों की सेवा और विहार के दौरान उचित दूरी बनाए रखना भी अनुशासन का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि सेवा करते समय साधु-संतों के नियमों और मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए। यह परंपरा भगवान महावीर के समय से चली आ रही है।

उन्होंने भाषा समिति का महत्व बताते हुए कहा कि व्यक्ति को हमेशा सोच-समझकर और मधुर वाणी में बोलना चाहिए। ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिससे सामने वाले के मन में सम्मान और अपनत्व का भाव पैदा हो। अच्छी वाणी से विरोधी व्यक्ति के साथ भी संबंध सुधारे जा सकते हैं, जबकि कटु और गलत शब्द संबंधों में दूरी पैदा करते हैं।

आहार समिति के बारे में उन्होंने बताया कि साधु-साध्वियों को गोचरी के समय और नियमों का पालन करना चाहिए। भोजन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के प्रति भी सावधानी रखनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने वस्तुओं का उपयोग करने के बाद उन्हें निर्धारित स्थान पर रखने और उपयोग में आने वाली वस्तुओं के प्रति सम्मान का भाव रखने की प्रेरणा दी।

डॉ. वरुण मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के 25वें अध्ययन में वर्णित जयघोष और विजयघोष नामक दो ब्राह्मण भाइयों की कथा का उल्लेख किया। उन्होंने जीव-जगत के परस्पर संबंध और प्रकृति के महत्व को समझाते हुए कहा कि पृथ्वी पर जल, अग्नि और वनस्पति सहित प्रकृति के प्रत्येक तत्व का अपना महत्व है। मनुष्य को प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए और जल संरक्षण सहित पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धर्म के सिद्धांतों को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और जीवनशैली में अपनाना जरूरी है। उत्तराध्ययन सूत्र में बताए गए संयम, विवेक और सदाचार के संदेशों को जीवन में उतारने से व्यक्ति का जीवन सफल और सार्थक बन सकता है।

डॉ. अमरीश मुनि निराला की पुण्यतिथि पर डॉ. वरुण मुनि ने उनके जीवन से जुड़े संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि डॉ. अमरीश मुनि ने कम उम्र में दीक्षा लेकर गुरु सेवा और धर्म साधना को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया था। मरुधर केसरी के सानिध्य में उन्होंने अपने गुरु और गुरु भाइयों के साथ रहते हुए संयममय जीवन व्यतीत किया।

उन्होंने कहा कि बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद डॉ. अमरीश मुनि ने गुरु सेवा और धर्म के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। उनके जीवन में गुरु भक्ति, तप, त्याग और समर्पण के भाव हमेशा प्रमुख रहे। उन्होंने उनके साथ बिताए समय का स्मरण करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व और सेवाभाव आज भी स्मृतियों में अंकित है।

धर्मसभा में डॉ. अमरीश मुनि के गुरु भाई एवं युवा मनीषी महेश मुनि की जन्म जयंती पर भी अनुमोदना की गई। वक्ताओं ने बताया कि महेश मुनि ने अपने जीवन में संयम और गुरु सेवा को विशेष महत्व दिया। उन्होंने अंतिम समय में डॉ. अमरीश मुनि की सेवा भी की थी। अमृत मुनि, अमरीश मुनि और महेश मुनि के बीच गुरु भाइयों जैसा स्नेह और आत्मीयता रही। इससे पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने भी अपने प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म और गुरु भक्ति का संदेश दिया।

मंत्री प्रकाश कटारिया ने धर्मसभा में डॉ. अमरीश मुनि निराला के जीवन परिचय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 18 सितंबर 1964 को खावनपुरा में पिता बस्तीमल जी और माता पानी देवी के घर हुआ था। बचपन से ही मिले संस्कारों के कारण उनमें वैराग्य भावना जागृत हुई और मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने गुरुदेव से दीक्षा ग्रहण कर सुकन मुनि महाराज के शिष्य के रूप में संयम जीवन अपनाया।

उन्होंने बताया कि डॉ. अमरीश मुनि ने धर्म साधना के साथ साहित्य और विभिन्न विद्याओं का ज्ञान अर्जित किया तथा युवा पीढ़ी तक धर्म और जिनवाणी के संदेश पहुंचाने का प्रयास किया। उनके जीवन में तप, त्याग, सेवा और गुरु भक्ति का विशेष स्थान रहा। कटारिया ने उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया।

महेश मुनि के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि माता इंदिरा देवी और पिता मोहनलाल कड़िया के घर जन्मे महेश मुनि ने 19 वर्ष की आयु में वैराग्य धारण कर दीक्षा ग्रहण की। गुरुदेव सुकन मुनि के सानिध्य में उन्होंने संयम और गुरु सेवा के मार्ग पर अपना जीवन समर्पित किया। उनकी जन्म जयंती पर सभी श्रद्धालुओं ने अनुमोदना व्यक्त की।

कार्यक्रम के दौरान भीलवाड़ा से आई 51 तपस्या करने वाली श्राविका को गुरुदेव सुकन मुनि ने आशीर्वाद प्रदान किया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने तपस्या और साधना के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। चातुर्मास कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे।

Rajasthan Today

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