मरुधरा सिहनी महासती तेज कंवरजी की पुण्य स्मृति पर गुणगान, 51 तपस्या करने वाले दर्शनजी बोलिया का संघ ने किया बहुमान

पाली : श्री रघुनाथ स्मृति भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत बुधवार को मरुधरा सिहनी महासती तेज कंवरजी महाराज का पुण्य स्मृति दिवस श्रद्धा, भक्ति और तप-त्याग के भाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर उपस्थित संतों ने महासतीजी के संयममय जीवन, धर्म साधना और जिन शासन के प्रति उनके योगदान का गुणगान किया। कार्यक्रम में भीलवाड़ा से आए 51 तपस्या करने वाले दर्शनजी बोलिया का भी संघ की ओर से बहुमान किया गया।
धार्मिक आयोजन के दौरान डॉ. वरुण मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के 26वें और 27वें अध्ययन के माध्यम से साधु जीवन की मर्यादाओं, आचरण और अनुशासन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि साधु जीवन को निर्मल और अनुशासित बनाने के लिए क्षमाशीलता, विनम्रता, गुरु आज्ञा का पालन और मर्यादित व्यवहार जैसे गुण आवश्यक हैं। साधु के प्रत्येक कार्य में संयम और जागरूकता होनी चाहिए। गुरु की अनुमति लेकर कार्य करना, किसी के कार्य में अनावश्यक बाधा नहीं डालना तथा अपनी दिनचर्या में अनुशासन बनाए रखना भी साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि जीवन में नियमों और मर्यादाओं का पालन व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारता है। समाज में भी अच्छे आचरण और अनुशासन से सकारात्मक वातावरण बनता है। धर्म साधना केवल उपदेशों तक सीमित नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में उतारना भी आवश्यक है।

इससे पूर्व साध्वी प्रीतिसुधा ने नारी सम्मान के महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को विशेष सम्मान दिया गया है। मां काली, दुर्गा और लक्ष्मी की पूजा इसी श्रद्धा का प्रतीक है। तीर्थंकरों को जन्म देने वाली माताएं भी नारी ही हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को नारी का सम्मान करना चाहिए।
साध्वीजी ने महासती तेज कंवरजी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने संयम, त्याग और साधना से समाज के हृदय में विशेष स्थान बनाया। उनका जीवन धर्म के प्रति समर्पण और दृढ़ संकल्प की प्रेरणा देता है। उनके आदर्शों को याद करना और जीवन में अपनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
गुरुदेव सुकन मुनि ने महासती तेज कंवरजी महाराज की पुण्य स्मृति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनका जीवन विद्वता, साधना, सेवा और त्याग का प्रेरणादायी उदाहरण रहा। उन्होंने बताया कि महासतीजी ने पूज्य गुरुदेव मरुधर केसरी मिश्रीमलजी महाराज के सानिध्य में दीक्षा ग्रहण कर धर्म साधना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके संयममय जीवन और जिन शासन की प्रभावना के कार्यों को सदैव स्मरण किया जाएगा।
उन्होंने भीलवाड़ा से आए 51 तपस्या करने वाले दर्शनजी बोलिया की तपस्या की अनुमोदना करते हुए कहा कि तप और त्याग जैन धर्म की महत्वपूर्ण साधना हैं। तपस्वियों का सम्मान और उनकी अनुमोदना करने से समाज में धर्म के प्रति श्रद्धा और प्रेरणा का भाव बढ़ता है।

कार्यक्रम में दर्शनजी बोलिया की तपस्या के उपलक्ष्य में संघ की ओर से उनका सम्मान किया गया। तपस्या के पारणा के लाभार्थी बादल बाई एवं भीकमचंदजी नवरत्न पगारिया रहे। इस अवसर पर मंत्री प्रकाश कटारिया, संघ अध्यक्ष पदमचंद ललवानी, लक्ष्मीचंद संचेती, संपतजी, लाभचंदजी और केवलचंदजी धोका ने तपस्वी भाई को शॉल, साफा एवं स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया तथा गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया।
मंत्री प्रकाश कटारिया ने कहा कि महासती तेज कंवरजी महाराज का स्मृति दिवस जप, तप, त्याग और सामायिक के रूप में मनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि महासतीजी ने अपने ज्ञान, साधना और सेवा से पूरे भारत में धर्म की प्रभावना की। उनके योगदान को देखते हुए गुरुदेव ने उन्हें ‘मरुधरा सिहनी’ की उपाधि से विभूषित किया था। उन्होंने बताया कि 18 नवंबर को महासतीजी की जन्म जयंती भी मनाई जाएगी।
कार्यक्रम में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने महासती तेज कंवरजी महाराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके संयममय जीवन को नमन किया। वहीं तपस्वी दर्शनजी बोलिया की तपस्या की अनुमोदना कर उनके प्रति सम्मान प्रकट किया।



